संयम ही जीवन का श्रृंगार है -मुनिश्री

May 31 2020

ग्वालियर। संयम ही जीवन का श्रृंगार है। मनुष्य संयम धारण कर सकता है, इसलिए समस्त जीवों में वह श्रेष्ठ है। जिसके जीवन में संयम नहीं, उसका जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी जैसा है। उक्त उद्गार परम पूज्य  मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने रविवार को हरिशंकरपुरम स्थित महेशचंद जैन के निजनिवास पर धर्मचर्चा में व्यक्त किए। मुनिश्री विजयेश सागर महाराज भी मौजूद थे।
मुनिश्री ने कहाकि यदि नदी बिना तटों के बहती है तो वह अपने लक्ष्य से भटककर सागर तक नहीं पहुँचती और सूख जाती। इसी प्रकार संयमी जीवन ही अपने अनंत सुखों को प्राप्त कर सकता है। संयम को धारण करने का हमें पूर्ण अधिकार मिला है लेकिन सांसारिक प्राणी पंचेन्द्रिय विषय के वशीभूत होकर इससे दूर भागते हैं। जिससे वह जीवन रूपी गाड़ी में सफल नहीं हो पाते।
मुनिश्री ने कहाकि घोड़े को यदि लगाम न लगी हो तो घोड़ा बेकाबू होकर अपने सवार को किसी खड्डे में गिरा देता है, इसी तरह इन्द्रियों पर आत्मा यदि अंकुश न लगावे तो इन्दियां भी आत्मा को दुर्गति में डाल देती हैं। इस कारण अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण लगाकर इन्द्रियों को अपने वश में रखना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहाकि आलोचना से कोई भी नहीं बच सकता। जो मनुष्य जितना बड़ा होता है, उसकी आलोचनाएं भी उतनी ही बड़ी होती हैं। इसलिए आलोचना से घबराकर धैर्य नहीं खोना चाहिए। आलोचना दो प्रकार की होती है- रचनात्मक और विध्वंसात्मक। प्रत्येक मनुष्य को जीवन में किसी न किसी समय आलोचना का शिकार होना ही पड़ता है।