भूख से जान निकल जाती इसलिए पैदल सफर पर निकले

May 13 2020

 ग्वालियर। मजदूरी करने के लिए छह माह पहले गए थे और जो कमाया था, वह खत्म हो गया। हालात यह थे कि अपना पेट भरने के लिए दो जून की रोटी मिलना मुश्किल हो गई थी और बच्चों को दूध और बिस्कुट तक नसीब नहीं हो रहा था। कोरोना से मौत आती उससे पहले भूख से जान निकल आती। इसलिए पैदल सफर करते हुए अपने घर पर जा रहे हैं। यह बात बुधवार सुबह चिरवाई नाके पर अहमदाबाद से पैदल आ रहे रामगोविंद, गोपाल सिंह, महिला सावित्री ने कही।
अहमदाबाद में छह माह पहले यह बेलदारी और पेंटिंग का कार्य करने के लिए गए थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते यह वापस नहीं आ सके। सरकार द्वारा मजदूरों को लाने के लिए ट्रेन चलाई जा रही है और उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाया जा रहा है, लेकिन आज भी हजारों मजदूर ऐसे हैं जो पैदल सफर करने के लिए मजबूर हैं। सरकार और प्रशासन इनकी ओर ध्यान ही नहीं दे रहा है।
बुधवार की सुबह चिरवाई नाके पर दो दर्जन से ज्यादा मजदूर परिवार पैदल- पैदल पगडंडी से चले आ रहे थे। जब उनसे पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि वह छह माह पहले अहमदाबाद गए थे। वहां रहकर जो कमाया था वह पूरा खर्च हो गया और वहां के प्रशासन से गुहार भी लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई तो पैदल ही अपने घर अंबाह जाने के लिए निकल आए। मजदूरों का कहना था कि वह एक दिन में 7 से आठ घंटे चलते हैं और अपना सफर सुबह पांच बजे शुरू कर देते हैं। रात गहराते ही जहां राह मिलती है वहीं सड़क किनारे सो जाते हैं।        
 पुलिस ने की मदद
अहमदाबाद से आ रहे मजदूरों ने बताया कि वह 6 मई को चले थे और आज ग्वालियर आ पाए हैं। मजदूरों का कहना था कि रास्ते में पुलिस ने उनकी मदद की है और वाहनों में भी बैठाया है, लेकिन अधिकांश सफर पैदल ही तय करना पड़ा है। कुछ स्थानों पर पुलिस ने पेट भरने के लिए खाने के पैकेट दिए, लेकिन बच्चों के लिए दूध और बिस्कुट मिलना मुश्किल हो गया।