तप के बिना नहीं टिकता कोई धर्म - मुनिश्री

Apr 26 2020

ग्वालियर। तप में जो विश्वास करता है, वहीं मोक्ष में जाता है। तप के बिना कोई धर्म टिक नहीं सकता है।  संसार का कोई भी धर्म देखे, तो उसमें तप का महत्वपूर्ण स्थान है। अंग्रेज फास्ट बोलते है, मुस्लिम रोजा बोलते है और हिन्दू इसे उपवास बोलते है। तप का आशय यह है कि त्यागे वहीं आगे रहता है। शरीर में कहीं दुखता है, तो उसे तपाते है। जैसे लकड़ी में कील नहीं जाती,लेकिन वह आग में जलकर राख हो जाती है। वैसे ही तपस्या की आग कर्मों को स्वाहा करती है।यह बात राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने रविवार को अक्षय तृतीया पर धर्मचर्चा में व्यक्त किए! मुनिश्री विजयेश सागर महाराज भी मौजूद थे!
मुनिश्री ने कहा कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर भगवान अदिनाथ ने मुनि दीक्षा ग्रहण करने के बाद छह माह तक उपवास की प्रतिज्ञा लेकर तपस्या में लीन हो गये। छह माह बाद उपवास की समाप्ति के बाद वह आहार हेतु निकले किंतु श्रावकों को मुनियोचित आहार-विधि का ज्ञान नहीं होने के कारण उनका आहार नहीं हो पाया। इसके बाद बिना आहार के ही वे वापस आ गये और लगभग एक वर्ष तक और निराहार रहकर अपनी तपस्या शुरू कर दी।  लगभग एक वर्ष बाद वे आहार हेतु हस्तिनापुर पहुंचे जहां राजा श्रेयांस को पूर्वभव में दिये गये आहार आहार-विधि का अचानक ज्ञान हो गया और उन्होंने इच्छु रस (गन्ने का रस) आहार में दिया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इसीलिए आज का दिन जैन धर्म में अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन आदर्श कलम ने बताया कि  अक्षय तृतीया पर भगवान आदिनाथ का प्रथम आहार हुआ था। वही मुनिश्री का आहारचर्या लोगो ने संपन्न कराई गई।