दान अहंकार के साथ नहीं, त्याग से करें-मुनिश्री

Apr 15 2020

ग्वालियर। दानी का स मान होता है और त्यागी की पूजा की जाती है। त्यागी की पूजा इंसान ही नहीं देवता भी करते हैं। दान और त्याग दोनों सगे भाई हैं। दान अहंकार के साथ नहीं त्याग भाव से देना चाहिए और देकर भूल देना चाहिए। मनुष्य की गति एक चौराहा है, जहां से चारों ओर जा सकते हैं। अधिक आरंभ, परिग्रह के कारण नरक गति में दूसरों को धोखा देकर तीर्यचगति में कशायों को शांत रखकर देव गति में और उत्तम तप कर कर्मों की निर्जरा द्वारा मोक्ष में जा सकते हैं। यह बात राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने बुधवार को तानसेन नगर स्थित न्यू कालोनी में धर्मचर्चा में व्यक्त की। मुनिश्री विजयेश सागर महाराज मौजूद थे।
मुनिश्री ने कहाकि अपराधियों को सजा अदालत देती है और पापी को सजा कर्मों की अदालत देती है। एक बार बिना सजा के संसार की अदालत से बच सकते हो, लेकिन कर्मों की अदालत से तो सजा मिलेगी ही। पाप दुनिया को दिखा कर करो जिस से पाप समाप्त हो जाए, मगर दान पुण्य छुपकर करो जिसके फल से अरिहंत पद प्राप्त कर सको। मुनि ने कहा कि कागज के टुकड़ों का दान तो कोई भी कर सकता है, मगर दिल के टुकड़े का दान तो केवल लड़की का पिता ही करता है। जिसका स मान सारे जगत को करना चाहिए। सबसे बड़ा दानी तो वही हैं। आज आपने कुछ समय के लिए घर का त्याग किया तो परमात्मा के दर्शन और गुरु के प्रवचन सुनने का सौभाग्य मिला। अगर जीवन भर के लिए घर का त्याग कर दोगे तो परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर एक दिन स्वयं परमात्मा बन जाओगे।
 जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज कोरोना वायरस को हराने के लिए  मंत्रो का उच्चारण कर भगवन शांतिनाथ का अजय जैन व विजय जैन परिवार ने भक्तिपूर्वक अभिषेक ओर शांतिधारा की। अभिषेक के उपरांत आरती की गई।