धर्म का मार्ग व पुण्य के साधन कभी नही छोंडऩा चाहिए-मुनिश्री

Apr 12 2020

ग्वालियर। धर्म के मार्ग और पुण्य संचय के साधन को कभी भी नहीं छोडऩा चाहिए। मनुष्य जन्म की अगर नैया पार इन्हीं दोनों मार्गों एवं साधनों से हो सकती है। धर्म का मार्ग और पुण्य संचय के साधन एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं, क्योंकि जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलेगा, वह पुण्य के कार्य भी करता है और पुण्य के साधनों का संचय करता है। इंसान कई तरह के पुण्य का संचय कर सकता है। यह बात मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने रविवार को तानसेन नगर स्थित न्यू कालोनी में धर्मचर्चा में कही।
मुनिश्री ने कहा कि धर्म का मार्ग जीवन को शांति देता है। इंसान के लिए धर्म के साथ-साथ शांति का जीवन मिल जाए, तो इससे बड़ी पूंजी कुछ भी हो नहीं सकती। हम अपने जीवन में इनका समावेश आसानी से कर सकते हैं, परंतु इंसान चाहकर भी नहीं करता। इसके कारण वह भटक रहा है और भटकता ही रहेगा भटक-भटक कर अपना जीवन मनुष्य पूरा कर लेगा और फिर पता नहीं उसे कौन सा भव मिलेगा। उन्होंने कहा कि विचारों का संप्रेषण इतना प्रबल होता है कि वह सामने वाले व्यक्ति के विचारों को प्रभावित करता है। इन परमाणुओं का तारत य एक दूसरे से श्रृंखलाबद्ध जुड़ा है। विचारों से ही संस्कारों की उत्पत्ति होती है और विचार ही हमारे जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हैं। इसलिए मनुष्य को हमेशा अपनी लगन भगवान के प्रति लगाना चाहिए, जिससे भव से पार हो जाए। उन्होंने जैन धर्म के बारे में बताया यह धर्म क्रिया आधारित धर्म है। इसमें व्यक्ति की दिनचर्या और जीवन शैली को सुदृढ़ करने का तरीका बताया गया है।
  जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज कोरोना वायरस को हराने के लिए प्रतिदिन अनुष्ठान कर रहे है। आज मुनिश्री ने मंत्रो का उच्चारण कर भगवन शांतिनाथ का अजय जैन व विजय जैन अमन जैन ने अभिषेक ओर शांतिधारा की। अभिषेक के उपरांत आरती की गई।