सुख-दुख दोनों अस्थाई, मेहमान की तरह आते-जाते हैं : मुनिश्री

Mar 21 2020

 ग्वालियर। सामान्य दृष्टि से हम जब अच्छा पाने की सोचते हैं तो हमारी दृष्टि सांस्कारिक विषयों की ओर जाती है। जैसे अच्छी नौकरी मिल जाए, अच्छी दुकान चले, अच्छा मकान मिल जाए, अच्छी पावरिस, अच्छा परिवार यानी की हमारी दृष्टि सिर्फ सांसारिक गतिविधियों की ओर रहती हैं। यदि सुख ही सुख रहे तो व्यक्ति का जीवन कुमार्ग पर चला जाता है। और दु:ख ही दु:ख आते रहें तो भी जीवन चल नहीं पाता हैं। लेकिन इतना जानना कि ना तो सुख स्थाई है और न दुख स्थाई है। दोनों ही मेहमान हैं, जो कि आते हैं और चले जाते हैं। यह बात राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्ष सागर महाराज ने शनिवार को हरिशंकर पुरम में धर्मचर्चा में कही!
    संसार को दुखों का हार बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि पूर्णत: व्यक्ति सुख से रह सके यह संभव नहीं है। वह चाहे अमीर हो या गरीब! व्यक्ति को अपने परिश्रम का निष्कर्ष निकालना चाहिए। दुख से सुख में जाने के प्रयास की बजाय दुर्गुणों से सद्गुणों, बुराई से अच्छाई, पाप-पुण्य की ओर जाने का जतन करना चाहिए। उन्होंने कहा, दुख से सुख में जाने में सफलता मिले, यह जरूरी भी नहीं है, लेकिन दुर्गुणों से सद्गुणों में आ गए तो कोई आपको दुखी कर ही नहीं सकता है।
   मुनिश्री ने कहा कि यदि जीवन में दुख है तो दुर्गुणों की वजह से है, वह अभिमान, क्रोध, छल कपट, स्वार्थ या लालच के रूप में होते हैं। उन्होंने कहा, व्यक्ति क्रोध से क्षमा की ओर चला जाए वह अनंत असीम आनंद की उपलब्धि प्रदान करता है। सुख को भी दो प्रकार का होना बताते हुए मुनिश्री ने कहा एक सुख साधनों से मिलता है, एक सुख साधना से मिलता है। इस मौके पर महेशचंद जैन, विजय जैन, पवन जैन, प्रवक्ता सचिन जैन, पंकज जैन, अमन जैन, मुकेश सक्सेना आदि मोजूद थे।