आत्म सुख को पाने के लिए भावना योग करना जरूरी

Mar 03 2020

ग्वालियर। जिस व्यक्ति की जैसी भावना होती है। उसके अनुरूप ही उसका हित अहित होने लगता है। चेतन मन को अवचेतन मन नहीं संचालित करता है। हमारी भावनाएं ही अच्छे बुरे जीवन का निर्धारण करती है। जो व्यक्ति आत्म सुख को पाना चाहते हैं उन्हें भावना योग का अ यास निरंतर करते रहना चाहिए। भावना का प्रभाव हमारे शरीर पर किस तरह पड़ता है। इसको हम प्रत्यक्ष रूप से जब किसी व्यक्ति को गुस्सा आता है या जब वह शांत मुद्रा में होता है उसके शरीर में स्पष्ट रूप से परीलक्षित होते देख सकते हैं। उक्त उद्गार जैन राष्ट्रसंत मुनिश्री विहर्श सागर महाराज ने मंगलवार को  थाठीपुर स्थित गुलाबचंद की बागीची जैन मदिर में मंगल प्रवेष के दौरान धर्मसभा में व्यक्त किए। क्षुल्लक विश्वोत्तर महाराज मोजूद थे। मुनिश्री के चरणो में प्रबंध समिति के अघ्यक्ष रविन्द्र सिंघई, उपाध्यक्ष पियूष सिंघई, सचिव नरेन्द्र जैन, सहसचिव रविंद्र सिघई, कोषाध्यक्ष वज्रसेन जैन भेंटकर आषीर्वाद लिया।
  मन के हारे हार है, मन के जीते जीत-मुनिश्री विजयेश सागर
   मुनिश्री विजयेश सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति का जब आत्मबल सुदृढ़ होता है तो बड़ी से बड़ी विपत्तियों से लडऩे की क्षमता स्वयमेव ही आ जाया करती है और इसके विपरीत हमारी सोच नकारात्मक होती है या निराशावादी होती है तो थोड़ी सी भी विपत्ति आने पर वह घबरा जाता है। जिसकी मन की शक्ति सुदृढ़ होती है वह अपनी मंजिल प्राप्त कर लेता है। वैसे भी कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। भावना योग करने से आत्मबल तो बढ़ता ही है इसके साथ ही इंद्रियों पर कैसे विजय प्राप्त की जाए उसकी कला से भी व्यक्ति पारंगत हो जाता है। मुनिश्री का 49 वां जन्म अवतरण दिवस 7 मार्च को लोहमंडी में मनेगी