सांसद ने किया वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का लोकार्पण
Mar 02 2020
ग्वालियर। जल संकट को लेकर पूरा विश्व समुदाय चिन्तित है। परन्तु इस समस्या के हल के लिये सभी स्तरों पर पूरी जिमेदारी व ईमानदारी के साथ एकीकृत प्रयास की आवश्यकता है। जलसंकट से निपटना जरूरी है तभी हमारा आज और कल वर्तमान एवं भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसके लिये कई वैज्ञानिक तरीके हैं जिनमें सबसे कारगर तरीका है, रेन वाटर हार्वेस्टिंग। वर्षाजल के संचय से जलस्रोतों को सजीव बनाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में हमने जो प्रकृति से लिया है वह प्रकृति को ही वापस लौटाना भी है। निसन्देह, वर्षाजल एक अनमोल प्राकृतिक उपहार है जो प्रतिवर्ष लगभग पूरी पृथ्वी को बिना किसी भेदभाव के मिलता रहता है। परन्तु समुचित प्रबन्धन के अभाव में वर्षाजल व्यर्थ में बह जाता है। वर्तमान जल संकट को दूर करने के लिये वर्षाजल संचय ही एक मात्र विकल्प है।
उक्त बात सांसद विवेक नारायण शेजवलकर ने तिकोनिया पार्क, सुरेश नगर, कर्नल साहब के घर के सामने लॉक जिला पंचायत ऑफिस के सामने ठाटीपुर एवं कन्या विद्यालय ठाटीपुर में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के कार्यों का लोकार्पण करते हुए कही। जिनकी लागत राशि लगभग दस लाख रूपये है। इस कार्यक्रम में विशिष्ठ अतिथि के रूप में डॉ.सतीश सिंह सिकरवार एवं पार्षद दिनेश दीक्षित उपस्थित थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विजय सक्सैना ने की इस अवसर पर लालमणी शर्मा, वी.के. शर्मा, राजीव दुबे, प्रशांत चतुर्वेदी, वीरेन्द्र सिंह राणा, रूप सिंह घुरैया, बबलू राणा, शशिकांत शिवहरे, मधुसुदन भदौरिया, नवीन शर्मा, पी.आर शर्मा, साहिब अली खान, कपिल शर्मा, नरेन्द्र सिकरवार, अरविन्द तोमर, मेडम कर्नल, श्रीमती उषा मिश्रा आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
श्री शेजवलकर ने कहा कि यदि वर्षाजल के संग्रहण की समुचित व्यवस्था हो तो न केवल जल संकट से जूझते शहर अपनी तत्कालीन जरूरतों के लिये पानी जुटा पाएँगे बल्कि इससे भूजल भी रिचार्ज हो सकेगा। अत: शहरों के जल प्रबन्धन में वर्षाजल की हर बूँद को सहेजकर रखना जरूरी है। श्री शेजवलकर ने कहा कि हमारे देश में प्राचीन काल से ही जल संचय की परपरा थी तथा वर्षाजल का संग्रहण करने के लिये लोग प्रयास करते थे। इसीलिये कुएं, बावड़ी, तालाब, नदियां,आदि पानी से भरे रहते थे। इससे भूजल स्तर भी ऊपर हो जाता था तथा सभी जलस्रोत रिचार्ज हो जाते थे। परन्तु मानवीय उपेक्षा, लापरवाही, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण ये जलस्रोत मृत प्राय: हो गए। कई जलस्रोत तो कचरे के गड्ढे के रूप में बदल गए। कई जलस्रोतों पर अवैध कजे हो गए। मिट्टी और गाद भर जाने से उनकी जल ग्रहण क्षमता समाप्त हो गई और समय के साथ वे टूट-फूट गए। अभी भी समय है कि इनमें से कई परपरागत जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करके उन्हें बचाया जा सकता है।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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