ग्वालियर व्यापार मेले में सजा स्वदेशी ग्राम, मिट्टी-गोबर के घरों से लेकर कुएं तक दिखी गांव की पुरानी संस्कृति

Oct 26 2026

ग्वालियर। आधुनिकता के इस दौर में जहां आज की पीढ़ी का जीवन मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक सुविधाओं के बीच सिमटता जा रहा है, वहीं ग्वालियर व्यापार मेले में बनाया गया स्वदेशी ग्राम लोगों को पुराने समय के ग्रामीण जीवन की याद दिला रहा है। यहां गांव की उस संस्कृति और जीवनशैली को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें मिट्टी और गोबर से लिपे घर, पारंपरिक चूल्हे, कुएं से पानी निकालने की व्यवस्था, चौपाल पर बैठकर बातचीत करना और जमीन पर बैठकर परिवार के साथ भोजन करना ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। स्वदेशी ग्राम में प्रवेश करते ही ऐसा अनुभव होता है, मानो हम आधुनिक शहर से निकलकर पुराने जमाने के किसी गांव में पहुंच गए हों। यहां प्रस्तुत ग्रामीण परिवेश लोगों को अपने बचपन, अपने बुजुर्गों और गांव से जुड़ी पुरानी परंपराओं की याद दिला रहा है।
 मिट्टी और गोबर से लिपे घरों में बसती थी गांव की असली पहचान
पुराने समय में गांवों के घरों का निर्माण स्थानीय संसाधनों से किया जाता था। मिट्टी से दीवारें बनाई जाती थीं और घर के फर्श तथा आंगन को मिट्टी और गोबर के मिश्रण से लीपा जाता था। उस समय यह ग्रामीण जीवन की सामान्य परंपरा थी। घर की महिलाएं नियमित रूप से आंगन और फर्श की सफाई कर उन्हें लीपती थीं, जिससे घर स्वच्छ और व्यवस्थित बना रहे। घर का आंगन केवल आने-जाने की जगह नहीं, बल्कि परिवार की दिनचर्या का महत्वपूर्ण केंद्र होता था। इसी आंगन में बच्चे खेलते थे, महिलाएं घरेलू काम करती थीं और परिवार के सदस्य एक साथ बैठकर सुख-दुख साझा करते थे।
चूल्हे पर बनता था भोजन, परिवार के साथ बैठकर खाने की थी परंपरा
पुराने ग्रामीण जीवन में रसोई का विशेष महत्व था। घरों में मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी, उपले और अन्य पारंपरिक ईंधन से भोजन तैयार किया जाता था। रोटी सेंकने से लेकर दाल और सब्जी बनाने तक, घर की रसोई परिवार की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा होती थी।भोजन तैयार होने के बाद परिवार के सदस्य अक्सर जमीन पर एक साथ बैठकर खाना खाते थे। उस समय भोजन केवल पेट भरने का माध्यम नहीं, बल्कि परिवार के साथ समय बिताने और आपसी अपनापन बढ़ाने का अवसर भी हुआ करता था।
 कुएं से पानी निकालना था रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा
आज घरों में नल और मोटर से पानी आसानी से उपलब्ध हो जाता है, लेकिन पुराने समय में गांवों के अनेक परिवारों की दिनचर्या कुएं, तालाब और अन्य पारंपरिक जलस्रोतों पर निर्भर रहती थी। महिलाएं सिर पर घड़ा रखकर या अन्य बर्तनों में पानी भरकर घर लाती थीं। कुएं से पानी निकालने के लिए रस्सी और बाल्टी का उपयोग किया जाता था। कई स्थानों पर पारंपरिक उपकरणों की सहायता से भी पानी निकाला जाता था। स्वदेशी ग्राम में कुएं से पानी निकालने की पारंपरिक व्यवस्था देखकर लोगों को उस समय की मेहनत और जीवनशैली को समझने का अवसर मिलता है।
महिलाओं की दिनचर्या में मेहनत, सादगी और परिवार की जिम्मेदारी
पुराने समय में ग्रामीण महिलाओं की दिनचर्या काफी मेहनत भरी होती थी। सुबह जल्दी उठकर घर-आंगन की सफाई करना, चूल्हा जलाना, परिवार के लिए भोजन तैयार करना, पानी भरना और पशुओं की देखभाल करना उनके दैनिक कार्यों में शामिल था। कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेतों के काम में भी पुरुषों का हाथ बंटाती थीं। परिवार और खेती-किसानी से जुड़ी जिम्मेदारियों के बीच वे घर की व्यवस्था संभालती थीं।
 चौपाल पर जुटते थे गांव के लोग, बातचीत से सुलझते थे कई मामले
पुराने गांवों में चौपाल सामाजिक जीवन का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। गांव के बुजुर्ग, किसान और अन्य ग्रामीण पेड़ के नीचे या किसी खुले स्थान पर चारपाई, पीढ़े अथवा जमीन पर बैठकर बातचीत करते थे।चौपाल पर खेती-किसानी, मौसम, फसल, परिवार और गांव से जुड़े विषयों पर चर्चा होती थी। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे और कई सामाजिक मामलों में आपसी बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास करते थे।
 पशुधन और खेती-किसानी के बिना अधूरा था गांव का जीवन
पुराने ग्रामीण जीवन में गाय, बैल, भैंस और अन्य पशुओं का महत्वपूर्ण स्थान था। पशुओं से दूध प्राप्त होता था और बैल खेती तथा सामान ढोने जैसे कार्यों में उपयोग किए जाते थे। गोबर का इस्तेमाल खाद बनाने और पारंपरिक ग्रामीण घरों में लीपने के लिए भी किया जाता था। खेती-किसानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार थी। खेतों में मेहनत करना, फसलों की देखभाल करना और मौसम के अनुसार कृषि कार्य करना लोगों की दिनचर्या का हिस्सा था।
 नई पीढ़ी के लिए अपनी संस्कृति को जानने का अवसर
आज की युवा पीढ़ी और बच्चों में से बहुत से लोगों ने मिट्टी और गोबर से लिपे घर, पारंपरिक चूल्हे, कुएं से पानी निकालने की व्यवस्था और चौपाल पर बैठकर बातचीत करने का जीवन करीब से नहीं देखा है। ऐसे में ग्वालियर व्यापार मेले में बनाया गया स्वदेशी ग्राम केवल मनोरंजन का स्थान नहीं, बल्कि पुरानी ग्रामीण संस्कृति को समझने और अपनी जड़ों से जुडऩे का अवसर भी है। यहां आकर बच्चे अपने माता-पिता और दादा-दादी से पुराने समय के अनुभव सुन सकते हैं। बुजुर्ग अपनी पुरानी यादें साझा कर सकते हैं और परिवार के सदस्य मिलकर उस जीवनशैली को समझ सकते हैं, जिसने भारतीय ग्रामीण समाज की पहचान बनाई।