परिवार में अनावश्यक हस्तक्षेप से बढ़ रहा तनाव, रिश्तों में मर्यादा और संवाद जरूरी : भदौरिया

Oct 11 2026

ग्वालियर। बदलते सामाजिक परिवेश में पारिवारिक रिश्तों के बीच बढ़ते अनावश्यक हस्तक्षेप और आपसी विवादों पर चिंता व्यक्त करते हुए जनशक्ति वेलफेयर सोसाइटी के संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं समाजसेवी अरुणेश सिंह भदौरिया ने कहा कि आज परिवारों में तनाव का मुख्य कारण केवल सास-बहू का रिश्ता नहीं, बल्कि एक-दूसरे के निजी जीवन में आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप और नियंत्रण करने की मानसिकता है। 
भदौरिया ने कहा कि लगभग 50 वर्ष पहले कई परिवारों में सास द्वारा बहू पर अधिकार जमाने, उसके निर्णयों में हस्तक्षेप करने और उसे परेशान करने जैसी बातें सुनने को मिलती थीं। समय बदला तो कुछ परिवारों में परिस्थितियाँ उलट गईं और सास-ससुर के सम्मान तथा अधिकारों की अनदेखी की शिकायतें सामने आने लगीं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में एक नई प्रवृत्ति भी देखने को मिल रही है, जहाँ कुछ परिवारों में विवाहित बेटी की माँ या मायके के अन्य सदस्य उसकी गृहस्थी के छोटे-बड़े निर्णयों में लगातार हस्तक्षेप करते हैं। सुबह से फोन पर क्या करना है, क्या नहीं करना है, किससे कैसे व्यवहार करना है, जैसे निर्देश देना कभी-कभी पारिवारिक तनाव का कारण बन जाता है।
हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया कि बेटी का मायके से संबंध जीवनभर बना रहना चाहिए। माता-पिता का स्नेह, मार्गदर्शन और सहयोग उसका अधिकार है। लेकिन मार्गदर्शन और नियंत्रण में अंतर होना आवश्यक है। इसी प्रकार सास-ससुर को भी बेटे और बहू की गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के बजाय उन्हें स्वतंत्रता, सम्मान और निर्णय लेने का अवसर देना चाहिए।
मंथरा किसी एक रिश्ते का नाम नहीं
भदौरिया ने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि मंथरा ने अपने हस्तक्षेप और कुटिल सलाह से अयोध्या के राजपरिवार में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी थीं, जिनके परिणामस्वरूप भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास जाना पड़ा। उन्होंने कहा, ‘मंथरा कोई स्त्री, रिश्ता या पदवी नहीं, बल्कि एक मानसिकता है। यह सास, बहू, माँ, पिता या परिवार के किसी भी सदस्य में हो सकती है। जहाँ अहंकार, भडक़ाने की प्रवृत्ति और अनावश्यक हस्तक्षेप होगा, वहाँ परिवार में विवाद और दूरियाँ बढऩा स्वाभाविक है। 
रामायण और महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भदौरिया ने कहा, ‘मंथरा की कुटिलता से वनवास पैदा हो सकता है, लेकिन वनवास के संघर्ष से श्रीराम जैसा गौरव भी सामने आता है। इसी प्रकार अन्याय के विरुद्ध धर्म और सत्य के मार्ग पर किया गया संघर्ष पांडवों जैसी विजय की गाथा भी लिख सकता है।‘उन्होंने कहा कि संघर्ष जीवन का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिवार को युद्ध का मैदान बनाना उचित नहीं है। हर विवाद का समाधान महाभारत नहीं, बल्कि संवाद, संयम, विश्वास और मर्यादा होना चाहिए।
शादी के बाद बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता दें
भदौरिया ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि बेटी के विवाह के बाद मायके वालों को उसकी खुशियों और कठिनाइयों में साथ देना चाहिए, लेकिन उसकी गृहस्थी को दूर बैठकर नियंत्रित नहीं करना चाहिए। वहीं बेटे के विवाह के बाद माता-पिता को भी बहू-बेटे के निजी जीवन और निर्णयों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार में किसी सदस्य के साथ अन्याय या उत्पीडऩ हो रहा हो तो उसका साथ देना हस्तक्षेप नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। लेकिन छोटी-छोटी बातों को भडक़ाकर रिश्तों में दरार पैदा करना अनुचित है।
परिवार में रामायण की मर्यादा हो, महाभारत का संघर्ष नहीं
समाज को संदेश देते हुए भदौरिया ने कहा, ‘रिश्तों को जोडऩे का प्रयास कीजिए, तोडऩे का नहीं। परिवार में श्रीराम की मर्यादा, माता-पिता का सम्मान, बहू-बेटियों की स्वतंत्रता और आपसी विश्वास होना चाहिए। मंथरा बनने के बजाय परिवार को एकजुट करने वाला बनिए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ समाज की आधारशिला है। यदि प्रत्येक सदस्य अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों और मर्यादाओं को भी समझे, तो अधिकांश पारिवारिक विवादों को आपसी बातचीत से सुलझाया जा सकता है।