कानून जानना ही नहीं, इंसानी परिस्थितियों को समझना भी जरूरी: न्यायमूर्ति मिश्रा

Sep 26 2026

ग्वालियर। कानून जानना ही नहीं, इंसानी परिस्थितियों को समझना भी जरूरी यह बात मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी की ओर से ग्वालियर में क्षेत्रीय न्यायिक शिक्षा सम्मेलन के शुभारंभ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कही। सम्मेलन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान उ‘च न्यायालयों के न्यायाधीश, न्यायिक अकादमियों के निदेशक, रजिस्ट्री अधिकारी और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारी शामिल हुए।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि न्यायदान केवल कानून की धाराओं को जानने तक सीमित नहीं है। न्यायाधीश के लिए जरूरी है कि वह अदालत में आने वाले व्यक्ति की वास्तविक समस्या, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और मानवीय संवेदनाओं भी समझें। उन्होंने कहा कि ‘जानना’ ज्ञान है, लेकिन ‘समझना’ उस ज्ञान का वास्तविक उपयोग है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि न्यायिक शिक्षा किसी निर्धारित सिलेबस तक सीमित नहीं हो सकती। बदलते समाज और अपराध के नए तरीकों के साथ न्यायपालिका को भी लगातार सीखना होगा।
उन्होंने डीपफेक, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक से पैदा हुई चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब वास्तविक और कृत्रिम साक्ष्य में अंतर करना कठिन हो रहा है। डीएनए रिपोर्ट, वॉयस सैंपल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की विश्वसनीयता समझने के लिए न्यायिक अधिकारियों को तकनीकी प्रशिक्षण जरूरी है। लगभग हर अपराध में डिजिटल डिवाइस और डिजिटल फुटप्रिंट महत्वपूर्ण साक्ष्य बनते जा रहे हैं।
फील्ड ट्रेनिंग पर दिया जोर
सम्मेलन में न्यायिक प्रशिक्षण में एथिक्स लॉजिक और साइक्लॉजी को शामिल करने, अधिकारियों को अपनी सीमाओं और पूर्वाग्रहों को पहचानकर सीखते रहने तथा फॉरेंसिक लैब, पुलिस जांच और जेल व्यवस्था की कार्यप्रणाली समझने के लिए फील्ड ट्रेनिंग पर जोर दिया गया।
मेडिटेशन को बढ़ावा देने पर जोर
मेडिटेशन को बढ़ावा देने के लिए न्यायिक अधिकारियों के अनिवार्य मध्यस्थता प्रशिक्षण तथा कोर्ट पहुंचने से पहले विवादों के समाधान में कम्युनिटी मीडिएटर की भूमिका पर भी चर्चा हुई। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका बदलती चुनौतियों के बीच लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा मजबूती से खड़ी रही है।