युवा किसके साथ है? सांस्कृतिक पहचान के साथ या अस्तित्व के सवाल के साथ?

Sep 16 2026

भारत के राजनीतिक इतिहास में युवाओं ने कभी केवल तालियाँ बजाने का काम नहीं किया। उन्होंने सत्ता से सवाल पूछे हैं, व्यवस्था को चुनौती दी है और कई बार देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी है। लगभग पचास वर्ष पीछे जाएँगे तो 1970 के दशक का छात्र आंदोलन दिखाई देता है। गुजरात और बिहार के छात्रों ने महँगाई, भ्रष्टाचार और व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाई। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में वह आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा, उसने पूरे देश की राजनीति की धारा मोड़ दी। 1975 आया तो लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा प्रश्न बन गई। 1980-90 के दशक में मंडल के सवाल ने युवा राजनीति को नई दिशा दी और अन्ना आंदोलन ने एक पूरी पीढ़ी को भ्रष्टाचार और जवाबदेही के प्रश्न पर सडक़ों तक ला कर खड़ा किया। इन तमाम आंदोलनों में एक समानता थी युवा किसी विचारधारा के अनुयायी नहीं थे, वे अपने भविष्य के बारे में सवाल पूछ रहे थे। ‘कारवाँ रुका नहीं करते किसी के मुड़ जाने से, सवाल जि़ंदा रहता है हर नस्ल के आने से ‘
यही वह बिंदु है जहाँ से उज्जैन और इंदौर के दो आगामी कार्यक्रमों को समझना चाहिए।
उज्जैन में ‘युवा धर्म संसद’ हो रही है। 24 राज्यों से 1,700 से अधिक युवाओं के इसमें शामिल होने की बात कही गई है। कार्यक्रम में धर्म, संस्कृति, राष्ट्र, शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक जीवन की चुनौतियों पर चर्चा होगी सरसंघचालक मोहन भागवत जी 18 सितंबर को वहाँ युवाओं से संवाद करेंगे। ठीक अगले दिन इंदौर में राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ के मंच पर होंगे। ऊपर से देखने पर दोनों कार्यक्रम एक जैसे लग सकते हैं दोनों युवाओं से संवाद कर रहे हैं, दोनों युवाओं के बीच जा रहे हैं, दोनों यही कह रहे हैं कि युवा देश का भविष्य हैं। लेकिन असली अंतर मंच पर नहीं, सवाल की दिशा में है। एक मंच पूछता है हम कौन हैं? दूसरा मंच पूछता है हमारे साथ हो क्या रहा है? यही बुनियादी फर्क है।
धर्म, संस्कृति, सभ्यता और अपनी जड़ों पर संवाद अपने आप में गलत नहीं है। भारत की आत्मा को समझने के लिए ऐसी चर्चा ज़रूरी भी है। लेकिन जब देश का एक नौजवान परीक्षा की तैयारी में पाँच साल लगा देता है और पेपर लीक हो जाता है, जब लाखों रुपये खर्च करके परिवार बच्चे को पढ़ाता है और नौकरी नहीं मिलती, जब प्रतियोगी परीक्षाएँ बार-बार विवादों में घिरती हैं, जब शिक्षा लगातार महँगी होती जाती है और उसके बाद भी नौकरी नहीं मिलती है तब उसके सामने पहला सवाल यह नहीं होता कि उसकी सांस्कृतिक पहचान क्या है। उसका पहला सवाल होता है मेरी परीक्षा कब होगी? मुझे नौकरी कब मिलेगी? मेरे साथ न्याय कब होगा?
और यहीं से ‘छात्रों की गूंज’ का अर्थ निकलता है। राहुल गांधी ने जून 2026 में इस अभियान की शुरुआत करते हुए छात्रों से पेपर लीक, महँगी फीस, परीक्षा व्यवस्था और रोजगार जैसे सवालों पर अपनी बात रखने और सुझाव देने को कहा। मोहन भागवत के हाल के वक्तव्यों में युवाओं को लेकर एक उल्लेखनीय बदलाव दिखता है। अगस्त 2026 में वक्तव्य में उन्होंने कहा कि युवाओं की शिकायतें वास्तविक हैं और लोकतंत्र में विरोध संवाद का एक माध्यम हो सकता है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और युवाओं की बात सुने जाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया यह बात स्वागत योग्य है, क्योंकि लोकतंत्र में असहमति को सुनना किसी एक दल या विचारधारा की संपत्ति नहीं हो सकता।
तो सवाल यह उठता है क्या युवाओं को केवल सुना जाना चाहिए, या उनकी समस्याओं की राजनीतिक कीमत भी तय होनी चाहिए? युवा से सि$र्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं कि तुम्हारी पीड़ा वास्तविक है। अगला सवाल यह है कि उस पीड़ा को बदलने के लिए व्यवस्था में क्या बदलेगा?
असली प्रश्न यह नहीं कि उज्जैन की युवा धर्म संसद बड़ी है या इंदौर की छात्रों की गूँज। 17-18 सितंबर को उज्जैन में युवा धर्म संसद होगी और 19 सितंबर को राहुल गांधी इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ से युवाओं के बीच होंगे। मीडिया और राजनीति इसे दो राजनीतिक धाराओं के आमने-सामने आने के रूप में देख सकती है, लेकिन इतिहास की दृष्टि से यह उससे बड़ा प्रश्न है कि भारत का युवा आने वाले समय में किस तरह का नागरिक बनेगा?
मुझे राहुल गांधी जी की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यहीं दिखाई देता है। वे युवाओं से यह कहने की कोशिश कर रहे हैं की मेरे पीछे मत चलो, अपनी आवाज़ उठाओ। और लोकतंत्र में शायद इससे अधिक आधुनिक, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक ज़रूरी युवा राजनीति की शुरुआत और कोई नहीं हो सकती।
 ‘रौशनी उधार की नहीं, अपने चरा$ग की माँगो,सवाल पूछना सीखो, यही असली इं$कलाब है।‘
प्रवीण पाठक
लेखक ग्वालियर दक्षिण से पूर्व विधायक हैं