हमारे शहर की खास विरासत है शास्त्रीय संगीत: पवैया
Aug 19 2026
ग्वालियर। ‘शास्त्रीय संगीत हमारे शहर की खास विरासत है और इसका आधार भक्ति है। भक्ति और संगीत का इतना बड़ा संगम दुनिया में केवल भारत में ही देखने को मिलता है। भक्ति संगीत के बिना शास्त्रीय संगीत अधूरा है।’ यह बात प्रदेश के वित्त आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया ने बुधवार को राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में कही। उन्होंने कहा कि जब विश्वविद्यालय में लगी कला प्रदर्शनी देखी तो ऐसा लगा जैसे वे किसी कला के मंदिर में खड़े हों। दुनिया के अधिकांश देश भू-राजनीतिक राष्ट्र हैं, जहां सत्ता के साथ उनके प्रश्न और संघर्ष भी बदलते हैं, लेकिन भारत भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। यहां संस्कृति और परंपराओं की यात्रा का कोई अंत नहीं है।
पवैया ने कहा कि करीब एक हजार वर्ष की गुलामी के बाद 1947 में जब देश आजाद हुआ तो भारत फिर सूर्य की तरह चमक उठा। इस लंबे संघर्ष में हमारी कला, संस्कृति और संगीत ने देश को जीवित रखा। कुंभ और सिंहस्थ जैसे आयोजन इसकी जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने कहा कि राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय आने वाले समय में ग्वालियर की महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में पहचाना जाएगा। प्रदेश के कला और संगीत के इस एकमात्र विश्वविद्यालय के विकास के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।
मोबाइल का युग है, लेकिन संगीत का युग हमेशा रहेगा
विशिष्ट अतिथि जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजकुमार आचार्य ने कहा कि भले ही आज मोबाइल का युग है, लेकिन संगीत का युग हमेशा रहेगा। हर समस्या का समाधान संगीत में छिपा है। व्यक्ति कितना भी तनाव में क्यों न हो, संगीत की मधुर धुन उसे मानसिक शांति प्रदान करती है। विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने विश्वविद्यालय का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। इससे पहले अतिथियों ने ललित कला संकाय के विद्यार्थियों द्वारा लगाई गई कला प्रदर्शनी का अवलोकन किया। प्रदर्शनी में चित्रों के माध्यम से देश की कला और सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत किया गया। अतिथियों ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का उद्घाटन भी किया।
स्थापना दिवस समारोह का सबसे प्रभावशाली आकर्षण महाराजा मानसिंह तोमर के जीवन पर आधारित नाट्य प्रस्तुति रही। कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे की संकल्पना पर तैयार इस नाटक का निर्देशन थियेटर विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु द्विवेदी, डॉ. पारुल दीक्षित और भरतनाट्यम विभागाध्यक्ष डॉ. गौरीप्रिया ने किया। करीब 50 कलाकारों ने 50 मिनट की प्रस्तुति में महाराजा मानसिंह तोमर के जन्म से लेकर उनके जीवन की गाथा को मंच पर साकार किया। प्रस्तुति की खासियत यह रही कि इसमें अभिनय के साथ गायन और भरतनाट्यम का भी प्रभावी समावेश किया गया। प्रस्तुति का समापन कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे द्वारा रचित स्तुति गान से हुआ। इसके बोल थे। ‘इस कला मंदिर को करें हम नमन.। ‘
समारोह में चंद्रप्रताप सिकरवार, अशोक आनंद, ध्यानेंद्र सिंह, डीएस चंदेल, डॉ. आशुतोष खरे, डॉ. पारुल दीक्षित, डॉ. अंजना झा, डॉ. मनीष करवड़े, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, डॉ. संजय सिंह, डॉ. गौरीप्रिया, पीआरओ कुलदीप पाठक सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी और बड़ी संख्या में कला रसिक मौजूद रहे।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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