काव्य संध्या का आयोजित हुई

Jul 20 2026

ग्वालियर। मध्य प्रदेश काव्य धारा मंच के तत्वावधान में वरिष्ठ कवि रविकांत दबंग के निवास स्थल डी-28, लोटस विले ओहदपुर, न्यू सिटी सेंटर में काव्यधारा मंच की काव्य संध्या का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता गीतकार ललित मोहन त्रिवेदी ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शायर अतुल अजनबी रहे। विशिष्ट अतिथि कवि रविंद्र रवि रहे। कार्यक्रम का संचालन जगमोहन श्रीवास्तव ने किया। स्वागत एवं आभार प्रदर्शन संस्था के अध्यक्ष नयन किशोर श्रीवास्तव ने किया। संस्था की ओर से सभी आए हुए अतिथियों का आभार प्रदर्शन संस्था के सचिव रविकांत दबंग ने किया।
 काव्य संध्या की शुरुआत करते हुए कहा—
‘रहमतें इंसान पर हर बार होनी चाहिए,
काफिरों पर ही खुदा की मार होनी चाहिए। ‘
 — रविकांत श्रीवास्तव ‘दबंग’
 ‘ये दरिया $गम का क्यों सूखा पड़ा है,
पहाड़ों में तो बारिश हो रही है।
बस एक पौधा लगाने से एक कमाल हुआ,
अब अपने ख़्वाब में सूखे शजर नहीं आते। ‘
— अतुल अजनबी
 ‘चापलूस चमचे चतुर चरण चाटकर चंद,
खुलेआम खाते मिले सत्ता का मकरंद। ‘
— रविंद्र रवि
 ‘जब भार हुई हो पायलिया, स्वीकार नहीं हो इकतारे,
तब तू ही बतला मन मुझको, लेकर जाऊँ किसके द्वारे। ‘
— ललित मोहन त्रिवेदी
 ‘हवा-पानी सब गायब है, चल रही हैं गर्म हवाएँ,
पेड़ों को मत काटो यारो, वरना जीवन भर पछताएँ। ‘
— नयन किशोर श्रीवास्तव
 ‘कीमती जि़ंदगी सस्ते रिवाज में चली गई,
दोस्ती दुश्मनी, पूजा-नमाज़ों में चली गई। ‘
— अमित चितवन
 ‘बेला तेरा आज छू रहा ऊँचा आसमान। ‘
— संजय खान
 ‘कोई तारी$फ मिलती है, न कोई दाद मिलती है,
नए पौधे हैं, सो हमको बहुत कम खाद मिलती है। ‘
— जितेंद्र तिवारी
 ‘क्या कहा, तन्हाई उसने खुशी से चुनी होगी।
ज़रा पूछो उसे, तन्हा रहकर क्या-क्या खुशी मिली होगी। ‘
— चेतना चौहान
 ‘जगत में ज्ञान की सरिता बहा दी बंसी वाले ने,
महाभारत में गीता सुना दी बंसी वाले ने। ‘
— ज्योति दिनकर
 ‘ना कोई ज़ख्म दे पाता, न बेदर्द तड़पता अगर,
दिल न बनने तुम, तुम्हारा क्या बिगड़ जाता। ‘
— रामसेवक शाक्यवार ‘स्वप्नश’
 ‘वह चाँद खिलौने मिट्टी के,
जो दरिया का मुख मोड़ गए। ‘
— जगमोहन श्रीवास्तव
 ‘नीम के पत्थर का सरिया क्यों बनें,
हम तो तेरी चाहत का जरिया क्यों बनें।
हर नदी सागर से मिलना चाहती है,
हम तो खुद सागर हैं, दरिया क्यों बनें। ‘
— डॉ. रमेश कटारिया ‘पारस’
 ‘मैं कविताएँ सुनती ही नहीं, खुद एक कविता हो जाती हूँ,
लोग मुझे पढ़ते हैं, मैं हर दिल में प्रेम-बीज बो सी जाती हूँ। ‘
— चेतना सिसोदिया