सभी स्वरों की प्रधानता वाली प्राचीन गायन शैली है ध्रुपद: मलिक ब्रदर्स

Jul 14 2026

ग्वालियर। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में मंगलवार को सांस्कृतिक समिति के तत्वावधान में स्पिक मैके के सहयोग से ध्रुपद पर व्याख्यान-सह-प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नोएडा से आए ध्रुपद कलाकार मलिक ब्रदर्स पं. प्रशांत मलिक एवं पं. निशांत मलिक ने ध्रुपद गायन शैली की विशेषताओं से विद्यार्थियों और श्रोताओं को अवगत कराया।
उन्होंने कहा कि ध्रुपद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन, गंभीर और आध्यात्मिक गायन शैलियों में से एक है। इसकी बंदिशों में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा अधिकांश रचनाएं देवी-देवताओं, प्रकृति और गुरुजनों को समर्पित होती हैं। उन्होंने बताया कि ध्रुपद में तबले का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि इसके साथ पखावज का वादन होता है, जिसे प्राचीन काल में मृदंग कहा जाता था। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में पखावज को मंगल वाद्य की श्रेणी में रखा गया है तथा प्राचीन देव प्रतिमाओं में भी इसके स्वरूप के दर्शन होते हैं। मलिक ब्रदर्स ने कहा कि ध्रुपद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी एक स्वर की नहीं, बल्कि सभी स्वरों की समान प्रधानता होती है। यही कारण है कि यह शैली संगीत साधना और आध्यात्मिक अनुभूति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती है।
व्याख्यान के साथ-साथ दोनों कलाकारों ने अपनी आकर्षक प्रस्तुतियों से सभागार को ध्रुपदमय बना दिया। उन्होंने राग शुद्ध सारंग में चौताल की बंदिश  'बैठे हरि, राधे संगÓ प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद राग मियाँ मल्हार में 'कारी बदरियाÓ की प्रस्तुति ने वातावरण को संगीतमय बना दिया। उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम में पखावज वादक पं. रविशंकर उपाध्याय ने पखावज पर सधी हुई संगति कर प्रस्तुतियों को और प्रभावशाली बना दिया।
कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम में सांस्कृतिक समिति की अध्यक्ष डॉ. पारुल दीक्षित, डॉ. अंजना झा, डॉ. मनीष करवड़े, डॉ. श्याम रस्तोगी, जनसंपर्क अधिकारी कुलदीप पाठक सहित संगीत संकाय के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विकास विपट ने किया।