बैंक का ‘परिवर्तन’ कार्यक्रम पूरे उत्तर भारत में 3.26 लाख एकड़ से ज़्यादा खेत को पराली जलाने से बचाने में बना मददगार
Jun 04 2026
ग्वालियर। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर, एचडीएफसी बैंक ने अपने सीएसआर कार्यक्रम ‘परिवर्तन’ के ज़रिए, सीआईआई फाउंडेशन के साथ मिलकर, अपनी ‘फसल अवशेष प्रबंधन’ (सीआरएम) पहल में एक बड़ी उपलब्धि की घोषणा की। 2025 के सीज़न में, पंजाब और हरियाणा के कुल 3,78,425 एकड़ खेतों में से 88 $फीसदी खेतों को पराली जलाने से बचाया गया। पंजाब के लुधियाना और संगरूर जि़लों, और हरियाणा के फतेहाबाद जि़ले के 380 से ज़्यादा गांवों के 86,000 किसानों तक पहुँचने वाला यह कार्यक्रम, उत्तर भारत में खेती से होने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की एक व्यापक और असरदार कोशिश है।
धान की कटाई के बाद पराली जलाना, उस गंभीर वायु प्रदूषण के मुख्य कारणों में से एक है जो हर सर्दियों में पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेता है। इससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और दिल व फेफड़ों की पुरानी बीमारियाँ और भी बढ़ जाती हैं। लगभग 1/3 एकड़ खेत में पैदा होने वाली एक टन धान की पराली को जलाने से वातावरण में तीन किलोग्राम ‘पार्टिकुलेट मैटर’ (बारीक कण) घुल जाते हैं, साथ ही ज़मीन से ज़रूरी पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं। 2025 में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53 फीसदी की कमी आने के बावजूद, छोटे और सीमांत किसानों को आज भी मशीनें हासिल करने और दो फसलों के बीच के कम समय में फसल के अवशेषों का प्रबंधन करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
एचडीएफसी बैंक की नुसरत पठान ने इस उपलब्धि के बारे में बात करते हुए कहा, ‘पराली जलाना सि$र्फ एक कृषि आदत नहीं है, यह एक व्यवस्थागत चुनौती है जिसकी जड़ें अर्थव्यवस्था, पहुंच और जागरूकता में हैं। एचडीएफसी बैंक परिवर्तन की सीआईइई फाउंडेशन के साथ साझेदारी ने इन तीनों पहलुओं को एक साथ संबोधित किया है। हज़ारों गाँव-स्तर की बैठकों, किसानों के लिए जागरूकता सत्रों और कृषि विभाग के साथ साझेदारी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिए किसानों की भागीदारी और उनके व्यवहार में स्थायी बदलाव लाया गया है।
सीआईआई फाउंडेशन के चंद्रकांत प्रधान ने कहा,‘इस कार्यक्रम को जो बात असाधारण बनाती है, वह है इसमें पैदा हुई सामुदायिक स्वामित्व की गहरी भावना है। जो किसान कभी पराली जलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं देखते थे, अब वे ‘इन-सीटू’ (खेत में ही) प्रबंधन के पैरोकार बन गए हैं और अपने पड़ोसियों को भी इसके लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करते हैं। जैसे-जैसे यह कार्यक्रम 2026-27 तक जारी रहेगा, एचडीएफसी बैंक परिवर्तन और सीआईआई फाउंडेशन नए गाँवों में इन पद्धतियों को और अधिक गहराई से अपनाने, ‘एक्स-सीटू’ (खेत के बाहर) पराली प्रबंधन के बुनियादी ढाँचे का विस्तार करने और पूरे क्षेत्र में दीर्घकालिक कृषि लचीलापन विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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