मासिक इंगित काव्य गोष्ठी सम्पन्न

Apr 13 2026

ग्वालियर। मध्यभारतीय हिन्दी साहित्य सभा ग्वालियर की मासिक  ‘इंगित काव्य’ गोष्ठी का आयोजन नई सडक़ स्थित माधव महाविद्यालय के कक्ष क्रमांक 31 में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता फॉरेस्ट कवि प्रकाश मिश्रा ने की। मुख्य अतिथि साहित्यकार डॉ सुधीर चतुर्वेदी रहे। विशिष्ट अतिथि कवि अमर सिंह यादव एवं सभापति कवियत्री कुंदा जोगलेकर मंचासीन रहीं। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन राम चरण रुचिर ने किया।
काव्य गोष्ठी में राष्ट्रीय भाव बोध, गुरु तेग बहादुर जयंती, डॉ.अंबेडकर जयंती, संत सूरदास जयंती, विश्व पृथ्वी दिवस, वैशाखी पर्व एवं सामयिक विषयों पर आधारित मौलिक काव्य रचनाओं की प्रस्तुति हुई। प्रारंभ में अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलित किया गया। सरस्वती वंदना पुष्पा शर्मा आनंद ने प्रस्तुत की। सभी मंचासीन अतिथियों का स्वागत पुष्प भेंट कर रामचरण रुचिर ने किया।
कार्यक्रम में प्रकाश मिश्रा, डॉ सुधीर चतुर्वेदी, अमर सिंह यादव, राम चरण,आलोक शर्मा, चेतराम सिंह भदोरिया, राजहंस त्यागी, संगीता विनोद करकरे, पुष्पा मिश्रा आनंद, राज किशोर वाजपेयी अभय, अमर सिंह यादव, अनिल कुमार कोचर, विजय कृष्ण योगी, श्वेता गर्ग स्वाति, व्यंकटेश बलवंत वाकड़े, डॉ मंदाकिनी शर्मा आदि ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम के अंत में सभी का आभार प्रदर्शन डॉ. मंदाकिनी शर्मा ने किया।

  काव्य पाठ में कवियों के कुछ काव्यांश इस प्रकार हैं
ध्वंश रचा है हथियारों ने, सृजन आज विस्थापित है।
अंतर्ध्यान हुई मानवता असुर भाव स्थापित हैं।
 राजकिशोर वाजपेयी ‘अभय‘
साख से टूटे गुल कभी मिलते नहीं हैं। गर घाव हों गहरे कभी सिलने नहीं है। सब कुछ मिल जाता है जमाने में अमर। मां-बाप जाने के बाद कभी मिलते नहीं हैं।
        अमर सिंह यादव
न हीरे और मोती या नगीना काम आता है।
 मैं सच कहता हूं मोहब्बत का पसीना काम आता है ।
           डॉ प्रकाश मिश्र
युद्ध होते रहे लेबनान और इजरायल ईरान इराक या कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच।
 मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
             कुंदा जोगलेकर
करे जो वीरों का सम्मान,
 रखें जो भारत मां का मान ,
उसे मैं गले लगाऊं!
उसे मैं गले लगाऊं।
              राम चरण ‘रुचिर ‘
कविता कवि का सुख होती है।
 कविता कवि का दुख होती है ।
दुख सुख की उधेड़बुन में कविता हंसती कविता रोती है ।
       चेतराम सिंह भदौरिया
भाषा की शुद्धि के लिए व्याकरण चाहिए।
 वैसे ही मानवता की शुद्धि के लिए सदाचरण चाहिए।
केवल दृव्य ही काफी नहीं है यश के लिए,
यशस्वी शुद्धता के लिए,
 शुद्ध अंत:करण चाहिए ।
           विजय कृष्ण योगी
राम बिना सीता है अधूरी ,
सीता के बिन सुने राम ।
           पुष्पा मिश्रा आनंद
हो गए हैं चिकरघिन्नी जैसे बैठे हों किसी चाक पर।
एक जमाना था जब रहता था गुस्सा मेरी नाक पर।
            आलोक शर्मा
जंगल तो जंगल,
 कहां आनंद मंगल,
  राजमहल में भी दंगल ।
              अनिल कोचर
शब्दों के कड़वे तीरों को दिल से बांध लेते हैं।
बड़ों के सम्मान की खातिर चुप्पी साध लेते हैं।
             श्वेता गर्ग ‘स्वाति‘
मां से हारी हर समस्या है,।
 मां का ही नाम तपस्या है।
           राजहंस त्यागी
यूं तो आईना देखा है ,
सुबह शाम देखा है
 एक दौर तो वह था 
,कि बार-बार देखा है।
         व्यंकटेश बलवंत वाकड़े
 लाना मेरे लिए नदी की रेत पर पड़ी शीपियां या छोटे-छोटे से शंख
या कि फिर बटोर लाना,
सरित सिकता पर बिखरे हुए रंग बिरंगी प्रस्तर।
      संगीता विनोद करकरे