ध्रुपद गायन भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूल धारा है-पं. सान्याल

Feb 20 2026

ग्वालियर। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव का समापन हुआ। समापन दिवस पर वाराणसी से आए पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात ध्रुपद गायक पंडित ऋत्विक सान्याल ने मुख्य वक्ता के रूप में उद्बोधन दिया। उन्होंने ध्रुपद गायन की परंपरा, उसके आध्यात्मिक पक्ष और बैजू बावरा के योगदान पर विस्तार से चर्चा की। इस अवसर पर ग्वालियर के पूर्व सांसद विवेक नारायण शेजवलकर भी उपस्थित थे।
अपने व्याख्यान में पंडित सान्याल ने बताया कि ध्रुपद गायन भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूल धारा है और बैजू बावरा को इसका प्रवर्तक माना जाता है। उन्होंने विद्यार्थियों को संगीत में स्वर, लय और राग-ताल के गहन अभ्यास की आवश्यकता समझाई। पंडित सान्याल ने कहा, राग ध्यान है, राग दृष्टि है और राग ही सृष्टि है, जिसके माध्यम से उन्होंने स्वर से स्वर-दर्शन की ओर बढऩे की प्रेरणा दी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संगीत का एक बड़ा हिस्सा मंचीय अनुभवों से सीखा जाता है।
कार्यक्रममें पंडित सान्याल ने विद्यार्थियों को राग तोड़ी में एक बंदिश सिखाकर व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया। इस प्रस्तुति में पखावज पर आदित्य दीप ने उनका साथ दिया। सांगीतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में युवा कलाकार आदित्य शर्मा ने राग भीम पलासी में ध्रुपद की प्रभावी प्रस्तुति दी। उनके साथ पखावज पर जयवंत गायकवाड़ और तानपुरे पर देवेश व वैष्णवी ने संगत की।
समापन सत्र में पंडित सान्याल ने राग शुद्ध सारंग में आलाप से शुरुआत की और धमार की एक आकर्षक बंदिश प्रस्तुत की। उनकी इस प्रस्तुति ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रोफेसर स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने महोत्सव को सफल बताया। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ कलाकारों के अनुभव से विद्यार्थियों को महत्वपूर्ण सीख मिली है। कुलगुरु ने यह भी जानकारी दी कि कई विद्वानों ने इस महोत्सव को प्रतिवर्ष आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की है।