गणतंत्र:अधिकारों का उत्सव, कर्तव्यों का संकल्प-ऋतिक दुबे

Jan 25 2026

26 जनवरी भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिवस है, जब एक स्वतंत्र राष्ट्र ने स्वयं को संविधान के अधीन शासित करने का ऐतिहासिक संकल्प लिया। 26 जनवरी 1950 को भारत ने केवल एक संवैधानिक दस्तावेज़ को लागू नहीं किया, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों को अपने राष्ट्रीय जीवन का आधार बनाया। यही कारण है कि गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन और उत्तरदायित्व का अवसर भी है।
भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। यह विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में बाँधने की अद्वितीय क्षमता रखता है। धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र और संस्कृति की अनेकताओं के बीच संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और समान अवसर का भरोसा दिया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ठीक ही कहा था संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज़ नहीं, यह राष्ट्र के जीवन का आधार है। आज जब हम संविधान को नमन करते हैं, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही अनिवार्य है।
वर्तमान समय में लोकतंत्र की मजबूती केवल संवैधानिक संस्थाओं से नहीं, बल्कि जागरूक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिकों से तय होती है। मतदान करना, कानून के प्रति सम्मान रखना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना—ये सभी नागरिक कर्तव्य लोकतंत्र की नींव को सुदृढ़ करते हैं। गणतंत्र तभी सशक्त होता है जब कानून सबके लिए समान हो और न्याय निर्भीक, निष्पक्ष तथा समयबद्ध हो।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता को सदैव उत्तरदायित्व से जोड़ा। उनका विचार था कि सच्चा अधिकार वही है, जो कर्तव्य की पूर्ति से जन्म ले। आज इस विचार की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
आज भारत वैश्विक मंच पर एक उभरती हुई शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। आर्थिक प्रगति, तकनीकी नवाचार और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। परंतु विकास की इस दौड़ में संवैधानिक मूल्यों से विचलन नहीं होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ मर्यादा, अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व और प्रगति के साथ समावेशन यही संतुलन गणतंत्र की आत्मा है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका बताया था। लोकतंत्र तभी जीवंत रहता है जब नागरिक प्रश्न पूछने के साथ-साथ संविधान की सीमाओं और मूल्यों का सम्मान भी करें। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु वह संवैधानिक मर्यादा के भीतर ही सार्थक होती है।
न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समाज में विश्वास स्थापित करना भी है। कानून का शासन तभी प्रभावी होता है जब अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचे। सरदार वल्लभभाई पटेल के शब्दों में कानून का सम्मान ही राष्ट्र की एकता और अखंडता की सबसे बड़ी शक्ति है।
एक अधिवक्ता के रूप में यह दृढ़ विश्वास है कि न्याय, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता के साथ ही लोकतंत्र फलता-फूलता है।
गणतंत्र दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि स्वतंत्रता कोई स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि सतत प्रयास है। संविधान केवल पढऩे या स्मरण करने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने का दस्तावेज़ है। जब प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होगा, तभी गणतंत्र अपने वास्तविक अर्थों में सशक्त और जीवंत रहेगा।
ऋतिक दुबे, अधिवक्ता