आधुनिक मिनिमली इनवेसिव तकनीकें स्कल बेस ट्यूमर के इलाज को बना रही हैं ज्यादा सुरक्षित और संभव
Jan 16 2026
ग्वालियर: स्कल बेस ट्यूमर शरीर के सबसे संवेदनशील हिस्सों में पाए जाते हैं। ये चेहरे के पीछे और खोपड़ी के आधार पर विकसित होते हैं, जहां आंखों की रोशनी, सुनने, चेहरे की मूवमेंट, निगलने की क्षमता से जुड़े क्रेनियल नर्व्स और दिमाग को खून सप्लाई करने वाली बड़ी ब्लड वेसल्स मौजूद रहती हैं। इसी वजह से इन ट्यूमर का इलाज बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि सर्जरी के दौरान थोड़ी सी भी गलती स्थायी और गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
पहले इन ट्यूमर तक पहुंचने के लिए बड़े ओपन ऑपरेशन या चेहरे के जरिए सर्जरी की जाती थी। हालांकि इससे ट्यूमर तक सीधा रास्ता मिलता था, लेकिन इसके साथ ज्यादा कट-छांट, हड्डी निकालना, चेहरे की बनावट में बदलाव, लंबा हॉस्पिटल स्टे और इंफेक्शन व नर्व डैमेज जैसी जटिलताओं का जोखिम भी जुड़ा रहता था। कई मामलों में ट्यूमर हटाने की कीमत मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ से चुकानी पड़ती थी।
मेदांता सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोसाइंसेज़ विभाग के डायरेक्टर एवं हेड डॉ. मनीष वैष ने बताया "पिछले दो दशकों में स्कल बेस सर्जरी का परिदृश्य काफी बदला है। एंडोस्कोपिक और कीहोल जैसी मिनिमली इनवेसिव तकनीकों ने, एडवांस इमेजिंग और माइक्रोसर्जिकल टूल्स के साथ मिलकर, इलाज को ज्यादा सुरक्षित बनाया है। एंडोस्कोपिक एंडोनेज़ल अप्रोच के जरिए नाक से ही पिट्यूटरी, क्लाइवस और कुछ एंटीरियर स्कल बेस ट्यूमर तक पहुंचा जा सकता है, जिससे दिमाग को हटाने या बाहर से चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। वहीं, जटिल या साइड में फैले ट्यूमर के लिए छोटे और सटीक क्रैनियोटॉमी अप्रोच अपनाए जाते हैं। इन आधुनिक तकनीकों को नई टेक्नोलॉजी का मजबूत सहारा मिला है। हाई-रिज़ॉल्यूशन रूक्रढ्ढ-ष्टञ्ज फ्यूजऩ, इन्ट्राऑपरेटिव न्यूरोनेविगेशन, क्रेनियल नर्व मॉनिटरिंग और फ्लोरोसेंस गाइडेंस से सर्जरी के दौरान ट्यूमर और नॉर्मल टिश्यू में फर्क करना आसान हो गया है। बेहतर रिकंस्ट्रक्शन तकनीकों के कारण ष्टस्स्न लीकेज जैसी जटिलताएं भी अब काफी कम हो गई हैं। जहां ट्यूमर पूरी तरह निकालना मुश्किल होता है, वहां स्टीरियोटैक्टिक रेडियोसर्जरी और प्रोटॉन थेरेपी जैसे विकल्प इलाज को और प्रभावी बनाते हैं।
हालांकि हर तकनीक के साथ कुछ जोखिम जुड़े रहते हैं। स्कल बेस सर्जरी के बाद ष्टस्स्न लीकेज, मेनिन्जाइटिस, नजर या सुनने की समस्या, हार्मोनल बदलाव या स्ट्रोक जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। कुछ बड़े और अत्यधिक फैले ट्यूमर में आज भी ओपन सर्जरी बेहतर विकल्प हो सकती है। इसलिए इलाज का चुनाव ट्यूमर की लोकेशन, साइज, मरीज की सेहत और फंक्शनल जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
आज के दौर में आधुनिक और पारंपरिक तकनीकों की तुलना करें तो मिनिमली इनवेसिव स्कल बेस सर्जरी में कम सर्जिकल ट्रॉमा, जल्दी रिकवरी, बेहतर कॉस्मेटिक रिज़ल्ट और कई मामलों में समान या बेहतर ट्यूमर कंट्रोल मिलता है। इसका भविष्य अर्ली डायग्नोसिस, बेहतर टेक्नोलॉजी और मल्टीडिसिप्लिनरी टीमवर्क में है, जहां उद्देश्य सिर्फ ट्यूमर हटाना नहीं, बल्कि मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ को सुरक्षित रखना भी है।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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