कहीं हम ग्वालियर की फिजाओं में आने वाली पीढ़ियों के लिए जहर तो नहीं बो रहे?‘‘

Jan 05 2026

ग्वालियर आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां से दो रास्ते निकलते हैं। एक रास्ता हमें फिर से उस गौरवशाली परंपरा की ओर ले जा सकता है, जिसने कभी इसे उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी बनाया था और दूसरा रास्ता वह है जहां चंद लोगों की क्षणिक पहचान की राजनैतिक महत्वाकांक्षा और सस्ती लोकप्रियता की होड़ हमें भीतर से खोखला कर सकती है। प्रश्न यह नहीं है कि ग्वालियर में क्या हो रहा है, प्रश्न यह है कि हम ग्वालियर के साथ क्या कर रहे हैं और उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ये क्यों होने दे रहे हैं ?

कुछ ही दशक पहले तक ग्वालियर को देश के सबसे विकसित और वैचारिक रूप से परिपक्व शहरों में गिना जाता था। यह वह भूमि है जहां तानसेन की स्वर लहरियां आज भी किले की प्राचीरों से टकराकर आत्मा को शांति देती है, जहां महर्षि गालव की तपस्या ने ज्ञान, त्याग और संवाद की परंपरा को जन्म दिया। जहां राजा सूर्यसेन से लेकर राजा मानसिंह तोमर तक और फिर सिंधिया घराने तक शासन का अर्थ केवल सत्ता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और संस्कृति का संरक्षण रहा। ग्वालियर की पहचान कभी भी सिर्फ शासकों के शासन से नहीं बल्कि उसकी पहचान बनी है उसके सामाजिक सौहार्द, कला की चैतन्यता, शैक्षणिक परम्पराओं से। यहां व्यक्ति को उसकी जाति से पहले उसके कर्म और संस्कार से पहचाना जाता था।
परंतु बीते कुछ वर्षों से ग्वालियर की सामाजिक फिजाओं में एक असहज तनाव महसूस किया जा सकता है। कभी डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर, कभी मनुवाद, अमनुवाद के अप्रासंगिक विमर्श पर, कभी राजा मिहिर भोज की ऐतिहासिक पहचान को लेकर, तो कभी 2 अप्रैल जैसी दुखद घटनाओं की स्मृति में संवाद की जगह टकराव ने ले ली है। बहस का स्थान नारेबाजी, पुतले, धरने, प्रदर्शनों ने और विचार का स्थान आरोप प्रत्यारोप ने ले लिया है।
यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है यह सामूहिक विवेक के क्षरण का विषय है। इतिहास हमें इसलिए नहीं दिया गया कि हम उसे हथियार बनाएं, बल्कि इसलिए दिया गया कि हम उससे सीखें जो गलतियां हुई हैं उन्हें पुनः न दोहरायें। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं अब राजशाही, सामंतशाही, वर्णवाद, गुलाम प्रथा या मनुस्मृति जैसी प्रथाओं या रीतियों का समाज में कोई स्थान नहीं है न ही उनका अनुशरण करके दो जातियों के बीच पीढ़ियों तक नफरत की दीवार खड़ा करने का कोई औचित्य। डॉ. अंबेडकर समानता, संविधान और आधुनिक भारत की चेतना के प्रतीक हैं। मनुस्मृति को लेकर वर्तमान में एक वर्ग में रोष है उसके जो कारण है वो वर्तमान में अब अप्रासंगिक हो गए हैं जिन्हें संपूर्ण समाज को नकारने की न केवल जरूरत है बल्कि समाज स्वयं अब उस जाति और वर्ण व्यवस्था की कोठरी से बाहर निकल रहा है किंतु हम सदैव किसी भी विषय के धूसर पक्ष को देखते हैं जबकि हमें सकारात्मकता के साथ उजले पक्ष की ओर ही ध्यान देना चाहिए।
 मनु स्मृति के कुछ सिद्धांत इस राष्ट्र के प्रत्येक वर्ग,समाज और व्यक्ति के लिए प्रासंगिक से है जिन्हें बाबा साहेब रचित संविधान ने और भी मजबूत किया है।
मनुस्मृति हमें धैर्य, क्षमा, संयम , अस्तेय, पवित्रता, इंद्रियनिग्रह, बुद्धि, ज्ञान, सत्य और अक्रोध की बातें भी तो बताती है जो कि जाति और वर्ग से परे प्रत्येक मानव के जीवन के लिए महत्वकारी लक्षण हैं जो आज भी नैतिक सामाजिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मनुस्मृति के उजले पक्ष को अगर देखे तो यह व्यक्तिगत शुद्धि, आत्मसंयम और सदाचार पर जोर देती है, जो किसी भी समाज के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक हैं। शिक्षा और ज्ञान: इसमें सभी के लिए शिक्षा और सभी से ज्ञान ग्रहण करने की बात कही गई है, जो वर्तमान में सामाजिक समरसता को बनाए रखने का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। किंतु क्या स्वयं मनुस्मृति के पक्षधर वर्तमान समय में इन सिद्धांतों का अनुसरण कर रहे हैं?
विश्व के सबसे महान नियम संहिता ‘‘भारतीय संविधान‘‘ को यदि बाबा साहेब ने मौलिक अधिकारों और लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की दृष्टि से संहिताबद्ध किया है तो उसके पीछे भी धर्मनिरपेक्षता, समाजवादी, लोक कल्याणकारी, समानता से परिपूर्ण विधि के शासन की पालना करने वाले राष्ट्र की परिकल्पना है जो वर्तमान में आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों के अनुरूप है।
यहां भी समाज के समक्ष एक यक्ष प्रश्न है कि जिन्हें बाबा साहेब के प्रति हमारी तरह अगाध श्रद्धा है क्या उन्होंने इस बात का प्रयत्न किया कि समाज में जारी व्यक्ति विध्वंसक गतिविधियों से न केवल बाबा साहेब के लिखित संविधान की वो स्वयं अवहेलना कर रहे हैं बल्कि बाबा साहेब की दिखाई हुई राह से भटक चुके हैं।
प्रश्न यह उठता है जिस मनु स्मृति की सकारात्मक बातों को उसके मानने वाले भी आज नहीं अपना रहे हैं, उसे आप बार बार जला कर क्यों अपनी राजनैतिक रोटियां सेकना चाहते हैं और इसके जरिए आखिर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? और दूसरी ओर, बाबा साहेब अंबेडकर जी जैसे इतिहासपुरुष को जिनका कद विश्व में जाति और धर्म की सीमाओं से बहुत ऊपर है, उनके अस्तित्व को क्यों कुछ लोग नकार रहे हैं और केवल एक जाति तक सीमित करना चाहते हैं?
क्या महात्मा गांधी केवल वैश्य समाज के हैं?
क्या सरदार पटेल केवल पटेलों के लिए पूज्य हैं?
क्या भगत सिंह केवल किसी एक वर्ग की धरोहर हैं?
नहीं। कभी नहीं।
वे सभी महापुरूष राष्ट्र की साझा चेतना हैं और डॉ. अंबेडकर भी उसी चेतना का अभिन्न अंग हैं। ये चिंतन का विषय है कि डाॅ. अम्बेडकर के जो पोस्टर जलाये जा रहे हैं या जो उनकी मूर्ति लगवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं क्या वास्तव में उन दोनों पक्षों ने ही कभी डॉ. भीमराव अंबेडकर जी को पढ़ा है या क्या कभी उनकी किताबों का अध्ययन किया है, उनके भावों को समझा हैं अथवा उनके विचारों को आत्मसात किया और यदि ऐसा नहीं है तो फिर वो भला क्या अंबेडकर जी के विचार अथवा उन्हें समझेंगे, जिसके कारण आठ दशकों से विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र सफलतापूर्वक चल रहा है तथा जिस संविधान का पूरा विश्व अनुसरण कर रहा है। बाबा साहेब की मूर्ति न लगने से उनका सम्मान न तो घट जाएगा और न ही मूर्ति लगने से उनके सम्मान में इजाफा हो जाएगा। बाबा साहब तो इस राष्ट्र की विचारधारा को मजबूत करने के लिए संकल्पित रहे हैं, इस तथ्य को गंभीरता से सोचना होगा। वहीं दूसरी ओर जो लोग मनुस्मृति को जला रहे हैं या जो लोग उसे जलने से रोक रहे हैं उन दोनों के कृत्यों को करने या न करने से न इतिहास बदलने वाला है, न मनुस्मृति के पन्ने। वे भी अन्य वेदों की तरह इतिहास के भाल अंक पर अंकित हैं। न आज वर्ण व्यवस्था है, न मनु परम्परा तो आखिर जलाने वाले और उसे जलने से रोकने वाले क्या सिद्ध करना चाहते हैं? यह भी समझना होगा कि मनुस्मृति जलाने से न तो ब्राह्मण समाज खंडित हो रहा है, और न ही अंबेडकर जी के पोस्टर जलाने से उनके कद में कोई कमी आने वाली है। उनके विचार, उनका योगदान और उनका स्थान इस राष्ट्र के इतिहास में अडिग है। लेकिन इन गतिविधियों अथवा प्रतीकों के माध्यम से जो कुछ लोग नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, वह लोग केवल दो समाजों के बीच, दो जातियों के बीच केवल और केवल गहरी अविश्वास की ऐसी खाई खोदना और उसमें नफरत का पानी भरना चाहते है, जिस पानी को पीकर आने वाली पीढ़ियां भी बर्बाद होने को अग्रसर होंगी।
यह खाई आज भले ही नारों और जुलूसों में दिखाई दे, लेकिन इसका बोझ आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा। हमारा वही युवा, जिनके हाथों में ग्वालियर का भविष्य है, आज ऐसी पहचान की लड़ाइयों में उलझाए जा रहे हैं जो उनके स्वयं के विकास को रोककर उन्हें एक कहीं न पहुंचने वाले तिराहे पर लाकर छोड़ेगी। आज वास्तव में ऐसे प्रश्न जो कि रोजगार, शिक्षा,उद्योग और तकनीक जैसे ग्वालियर के विकास से जुड़े हुए है वो वास्तविक प्रश्न कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं। अब भी यदि इस पर चिंतन न हुआ और दो वर्गों के मध्य यदि यही संघर्ष यही क्रम चलता रहा, तो हमारी अगली पीढ़ी अवसरों की नहीं, बल्कि टकरावों की विरासत पाएगी।
आज जरूरत है कि हमें समाधान खोजना होगा टकराव में नहीं बल्कि संवाद में।
 हमें ऐसे मंच बनाने होंगे जहां इतिहास को हथियार की तरह नहीं, बल्कि शिक्षक की तरह देखा जाए। राजनीतिक दलों को भी अपने अल्पकालिक लाभ के लिए समाज को बांटने से बचना होगा। प्रशासन को केवल कठोरता से नहीं, संवेदनशीलता से भी काम करना होगा। मैंने भी स्वयं, मध्यप्रदेश विधानसभा का सदस्य बनने के बाद से हमेशा यही प्रयास किया है कि समाज के किसी भी जाति, धर्म या वर्ग के व्यक्ति हों उन्हें एक दूसरे से जोड़ा जाए। मेरा ही नहीं बल्कि सभ्य समाज में प्रत्येक नागरिक का यह विश्वास है कि नफरत का बाजार कभी स्थायी समृद्धि नहीं दे सकता। नफरत न रोजगार देती है, न सुकून। समृद्धि और विकास केवल विश्वास, सहयोग, समन्वय,संवाद और प्रेम से ही आ सकता है। हमें यह महसूस करना होगा कि ग्वालियर की संगीत नगरी की आत्मा आज भी जीवित है तानसेन के सुरों में, गालव ऋषि की साधना में और आम नागरिक की सहजता में। हमारे समक्ष प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम वास्तव में उस आत्मा की रक्षा करना चाहते हैं ? यदि हम अपनी जन्मभूमि, अपनी कर्मभूमि ग्वालियर का वैभव वापस नहीं ला सकते, तो कम से कम उसे कलंकित तो न करें। यदि हम इतिहास नहीं बदल सकते, तो अपना भविष्य तो संवार सकते हैं। आज निर्णय हमारे हाथ में है हम जहर बोएं या शांति। और जो हम आज बोएंगे, वही हमारी आने वाली पीढ़ियाँ काटेंगी। ग्वालियर को फिर से जोड़ने का समय अब है, युवाओं को दिशा देने का समय अब है, इतिहास से सीख लेकर भविष्य गढ़ने का समय अब है। सिर्फ जातियों के ही प्रबुद्ध वर्गों को नहीं, सर्वसमाजों के लोगों को, प्रशासनिक अधिकारियों को प्रबुद्ध पत्रकारों को, सभ्य समाज के तमाम जिम्मेदारों को अब आगे आना ही होगा और इस अमिट कलंक से ग्वालियर को बचाना होगा। आज ग्वालियर के अधिकांश टकराव केवल इतिहास की अधूरी या एकांगी व्याख्याओं से जन्म ले रहा है।युवा पीढ़ी का रास्ता भटककर उसका पोस्टर जलाना, मनुस्मृति के ग्रंथ जलाना या महापुरुषों की स्मारकों को विवाद का केंद्र बनाना किसी भी सभ्य समाज को आगे नहीं ले जा सकता। वर्तमान में ग्वालियर में उभर रहा सामाजिक तनाव किसी एक व्यक्ति समुदाय या विचारधारा की देन नहीं है बल्कि यह वर्षों से जमा होती आई गलतफहमियों, अधूरे संवाद और राजनीति में अल्प समय में शीर्ष पर पहुंचने की कुछ लोगों की अति महत्ता का परिणाम है। इसलिए इसका समाधान भी किसी एक कदम से नहीं, बल्कि सामूहिक सतत प्रयास से ही संभव है। मेरा अनुरोध है सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते जो चंद लोग नफरत की दीवार खड़ी कर रहे हैं जातियों के बीच, समाजों के बीच वो कहीं हमारी आने वाली पीढ़ियों और ग्वालियर के विकास में सबसे बड़ा कई दशकों तक अवरोध न बन जाएं। एक बार आत्म चिंतन जरूर करें कि हम आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या देकर जा रहे हैं। ऊपर वाले की खातिर इस ग्वालियर के विकास की खातिर आने वाली पीढ़ी के भविष्य की खातिर कम से कम अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए इतना मत गिरो कि पूरे ग्वालियर को और मानवता को कलंकित करो। 
प्रवीण पाठक 
लेखक पूर्व विधायक एवं एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं