अपनत्व लिटरेचर क्लब की काव्य गोष्ठी हुई

Dec 24 2025

ग्वालियर। सिल्वर एस्टेट ग्वालियर में शहर में साहित्यिक चेतना को सशक्त करने के उद्देश्य से अपनत्व लिटरेचर क्लब के तत्वावधान में अपनत्व काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें नगर के कवि और कवयित्रियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
 इस साहित्यिक आयोजन का संयोजन कवि एवं चिकित्सक युगल डॉ. मनोज चोपड़ा साहिल एवं डॉ. भावना चोपड़ा आरोही द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन राजेश अवस्थी लावा ने किया। कार्यक्रम में विशिष्ट सहयोग कवि रामचरण चिराड़ रुचिर का रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना के साथ हुआ। काव्य-गोष्ठी में शहर के कवि एवं कवयित्री उपस्थित रहे। अमित चितवन, डॉ. उर्मिला, राज किशोर वाजपेयी, आलोक शर्मा, डॉ. ज्योति उपाध्याय, मधुलिका सिह, रेशमा, अरविंद सिंह जादौन, रामचरण, राजेश अवस्थी और चिकित्सक एवं कवि युगल डॉ. भावना चोपड़ा और डॉ. मनोज चोपड़ा ने अपनी उत्कृष्ट, संवेदनशील एवं मौलिक रचनाओं की प्रस्तुति दी।

जिनमें समाज, स्त्री, संवेदना, समय और मानवीय मूल्यों की गूंज स्पष्ट रूप से सुनाई दी! कुछ काव्यांश इस प्रकार हैं।
हम ही वंशज हैं राणा के,
ऋषियों की संतानें हम हैं।
विश्व विजय इतिहास हमारा
दावा करते हैं हम कम ही।
शौर्य सूर्य फिर से चमकाने
हम अपने स्व को पहचाने। 
राज किशोर वाजपेयी अभय

मिलने को तुमसे दिल मेरा ये बेकऱार है 
महबूब मेरे आजा तेरा इन्तज़ार है 
देखा न करो हमको सनम मुस्कुरा के तुम 
फिर कहते फिरोगे कि तुम्हें हमसे प्यार है 
 अमित चितवन 

माना कि तेरी प्यास का चारा नहीं हूँ मैं !
पी कर के मुझको देख ले, खारा नहीं हूँ मैं !
अब आ गए हो किसलिए, हक अपना जताने ;
तुमने तो कह दिया था, तुम्हारा नहीं हूँ मैं ! 
 डॉ. मनोज चोपड़ा साहिल 

जीवन के आयाम बहुत हैं,
हर पल चलते काम बहुत हैं।
तृष्णा कभी न मरने वाली,
जीवन में संग्राम बहुत हैं।
      रामचरण रुचिर

ना ही शिकवा ना, कोई गिला कीजिए।
प्यार से बस सभी, से मिला कीजिए।
उलझनें हैं बहुत, जिंदगी में तो क्या।
उलझनों से ही थोड़ी, सुलह कीजिए।
 अरविंद सिंह जादौन स्पष्ट

ज्ञान देना सरल, है कठिन अनुकरण !
समझो अनुभूतियों का सरल व्याकरण !
बन गया है ये जीवन भी प्रतियोगिता ,
मन की शांति का ही, हो रहा है क्षरण ! 
 डॉ.भावना चोपड़ा आरोही 

तेरे सब आरोप मैं अब अस्वीकार करता हूं।
फिर भी तेरा श्राप मां अंगीकार करता हूं।
 आलोक शर्मा

चित्त के आकाश पर उदासी के मेघ क्यों छाए हैं? 
जो मन की सुन्दरता को मलिन करने चले आए हैं! 
      डॉ. उर्मिला त्रिपाठी उर्मि

कविता पाठ की दो लाइन
महिलाओं के मेल से,
अब तन-मन घबराय।
ना जाने किस उम्र में,
मी टू बनकर आय।
 राजेश अवस्थी लावा

सुख का सागर है यह दुनियाँ
या दु:ख की बहती पतवार
सुख-दुख दोनों मिश्रित कहकर
झूठे भ्रम में भरमाया 
डॉ.ज्योति उपाध्याय

अंधियारे मे चौंक गई मैं, द्वार जड़ी सांकल जब खटकी 
तब महसूस हुआ यह मन को, शायद हवा बूले से भटकी
लेकिन सुबह हवा पूछती, मन की बात नही बतलाइ
जब-जब घिरे गगन में बादल, तेरी याद बहुत तब आई
मधुलिका सिह शीरी
कार्यक्रम के अंत में डॉ.भावना चोपड़ा आरोही ने सभी साहित्यकारों का आभार व्यक्त करते हुए,भविष्य में भी इस प्रकार के साहित्यिक आयोजनों को नियमित रूप से आयोजित करने का संकल्प लिया। यह साहित्यिक गोष्ठी साहित्य, विचार और अभिव्यक्ति का एक स्मरणीय उत्सव बनकर सफलतापूर्वक संपन्न हुई।