मां जननी है पिता जनक फिर ये वृद्धाश्रम क्यों? अशोक गर्ग
Nov 17 2025
आज वृद्धाश्रम में रहने वाली रहने वाले ऐसे वृद्धजन जिन्हें अपनो ने ही ठुकरा दिया! क्या यही हमारा समाज है? आज ऐसे बहुत से उदाहरण है कि बुर्जुग मां बाप को अपने ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है या वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जाता है या फिर पैसे के लिए अपने उन्हें मार दिया जाता है।
जैसा मैने कई जगह पढ़ा कि एक वृद्ध महिला के बेटे ने यह कहकर अपनी माँ को घर से निकाल कर सामान बाहर फेंक दिया और कहा कि मेरे घर में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है, और ना खाने के लिये रोटी है। बहू ने तो यहां तक कह दिया कि ‘कहीं भी जाओ लेकिन हमारे घर पर मत आना।’ अभी हाल में पढ़ा था कि एक बेटा अपनी बूढ़ी माँ को तीर्थस्थान पर घुमाने के बहाने रास्ते में छोडक़र चला गया। वहीं, एक 90 वर्षीय वृद्धा के करोड़पति बेटों ने यह कहकर अपनी माँ को घर से निकाल दिया कि मां तुम रात भर खांसती हो हमे सोने नहीं देती हो। कर्नाटक की अभी हाल ही की घटना जो अभी हुई थी एक 68 वर्षीय बुजुर्ग को उसकी पत्नी और बेटी ने, दोनों ने मिलकर पैसों ओर प्रॉपर्टी के लिए मार डाला जबकि वह स्वयं डीजीपी थे।
ये हृदय विदारक घटनाएं,कहानियाँ केवल वृद्ध माताओं की नहीं हैं, बल्कि वृद्धाश्रम में रह रहे उन सभी बूढ़े माँ-बापों और वृद्धजनों की ऐसी ही अनगिनत कहानियां अपनी-अपनी दास्तान बया करती है जिन्हें सुनकर किसी भी व्यक्ति का दिल भर आए।
आश्चर्य तब होता है जब इन बूढ़े माँ-बापों को ऐसी हालत तक पहुँचाने में हम और आप जैसे लोग ही जिम्मेदार है मेरा ऐसा मानना है। भगवान स्वरूप वाले माँ-बाप को अपने बच्चों के होते हुए दर-दर भटकना पड़ता है। कई बार वे इतने असहाय हो जाते हैं कि वे अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेते हैं।
एक मां अपने बच्चों के लिए सर्वश्य त्याग करती है खुद गीले में सोकर बच्चों को सुखे में सुलाती है, खुद भूखी रहकर अपने बच्चों को खाना खिलाती है और एक पिता अपने बच्चों के लिए खुद फटे कपड़े और जूते पहनता है पर अपने बच्चों के लिए अच्छे कपड़े और जूते पहनता है ,अपने कंधों पर बिठाकर अपने से ऊंचा देखना चाहते है। अपना सर्वस्य न्योछावर कर देते है पिता चाहता है एक पिता अपने नाम की बजाए बच्चों के नाम से पहचाना जाए।
मां जननी है पिता जनक फिर ये वृद्धाश्रम क्यों? आज के परिवेश में वृद्धा आश्रमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है क्या कारण है ,वृद्ध हो जाने पर जब माँ-बाप को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है तब शायद उन्हीं बच्चों को अपने माता-पिता और घर के बुजुर्ग बोझ लगने लगते हैं, क्योंकि वे,वेकाम के हो जाते है और शायद इसीलिए आज देश में वृद्धाश्रम कम पड़ रहे हैं।
आज प्राय: ये भी देखा जा रहा हैं कि आजकल के बच्चे बाहर जा कर जॉब कर रहे है या पढ़ रहे है और मां बाप मजबूरी बस एकल जीवन व्यतीत कर रहे है आज कल बड़े शहरों में वृद्धजन एकल जीवन बिता रहे है और उनके कर बार अप्रत्याशित घटना घट जाती है उनके केयरटेकर द्वारा या अन्य किसी के द्वारा हत्या कर दी जाती है।
वृद्धों की लगातार बढ़ रही संख्या की वजह से आज सरकार के साथ साथ निजी स्तर पर भी वृद्धाश्रम खोलने की ज़रूरत महसूस हो रही है। यहां यह बात सोचनीय है कि क्या हमारे माता-पिता की जि़म्मेदारी समाज की है, रिश्तेदारों की है, अन्य किसी की है, सरकार की है। क्या हमारा उनके प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है।
आज इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हम अपने कर्तव्यों व संस्कारों से परामुख हो रहे हैं? जब उन्होंने कभी हमें अकेला नहीं छोड़ा तो हम इतने स्वार्थी, लालची, विमुख कैसे हो सकते हैं कि बिना कुछ सोचे-विचारे नि:सहाय अवस्था में उन्हें कही भी किसी भी अवस्था में छोडक़र हम चले जाते हैं। जबकि हम सभी जानते है कि वृद्धावस्था में बुजुर्गों को शारीरिक, मानसिक, दुर्बलता,सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
बुढ़ापे में व्यक्ति को भावनात्मक, सकारात्मक और रचनात्मक सहारे की होती है। वे चाहते हैं कि घर के युवा सदस्य उनके साथ बैठें, उनके साथ हंसी मजाक करे कुछ ऐसा नया करे जिससे मनोरंजन हो, उनकी बात सभी सुने, उन्हें समय दें, पर जब उन्हें यह सब नहीं मिलता है तो वे अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं।
साथ ही परिवार में अपनी भूमिका को न समझे जाने के कारण वे अपने आप को उपेक्षित समझते लगते है जिसके कारण कुछ बुजुर्ग (डिप्रेशन) का शिकार हो जाते हैं। अकेले रहने को विवश वृद्धों में एक बड़ी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की बुजुर्ग आबादी अगले दशक में 41 प्रतिशत तक बढ़ जाने का अनुमान है, यानी 2031 तक इस देश में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जाएँगे। ऐसे में उनके साथ दुर्व्यवहार की संख्या में भी तेजी से इज़ाफा हो रहा है।
यहाँ इस बात पर भी गौर करना कुछ ज़रूरी है कि उन बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार अधिक होता है, जो आर्थिक और पूर्ण रूप से अपनी संतानों पर या परिवार पर निर्भर होते हैं। प्राय: ये भी देखा गया है कुछ माता पिता बुजुर्ग अपने जीते जी अपनी सम्पति, अपना कारोबार संतानों के नाम पर कर देते हैं; कुछ बच्चे ज़बरदस्ती अपने माँ-बाप की संपत्ति को अपने नाम करवा लेते हैं, ना करने पर या तो माँ-बाप को घर से निकाल देते हैं या खाने के लिये भी मोहताज़ कर देते हैं कई बार तो उन्हें अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है इसलिए मेरे विचार से प्रत्येक बुजुर्ग को अपने भविष्य के लिए आर्थिक रूप से सुदृढ़, मजबूत रहना आवश्यक है।
आंकड़ों की बात करें तो ‘हेल्पएज इंडिया’ एनजीओ द्वारा किये गए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चला कि कम से कम 47 प्रतिशत वृद्धजन अपने परिवारों पर आर्थिक और रूप से निर्भर हैं और 34 /:पेंशन एवं सरकारी नकद हस्तांतरण पर निर्भर हैं।
समाज और सरकार को भी चाहिए कि बुजुर्गों को यह भी जानकारी से अवगत कराए कि उनकी संतान या किसी रिश्तेदार (कानूनी वारिस) ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया , तो वो अपना हक कैसे हासिल करे , उनके हितों की रक्षा के लिये देश में कौन-कौन से कानून हैं, क्या प्रावधान हैं , क्या व्यवस्थाएं है इसकी जानकारी हेतु व्यवस्था या समय समय पर कैंप आदि का प्रावधान होना चाहिए।
परन्तु आज के परिवेश में बुजुर्गों के जीवन को सुनिश्चित करने के लिये कानून में कई तरह के प्रावधान हैं किए गए है *जिनमें एक कानून ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण कानून 2007’ है, जो विशेष रूप से संतानों द्वारा सताए जा रहे बुजुर्गों के लिये बनाया गया है। इसके तहत बच्चों/रिश्तेदारों के लिये माता-पिता/वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल करना, उनके स्वास्थ्य, उनके रहने-खाने जैसी बुनियादी ज़रूरतों की व्यवस्था करना अनिवार्य है।
इस कानून में यह प्रावधान है कि अगर बुजुर्ग अपनी चल अचल संपत्ति, बच्चों, या रिश्तेदार के नाम कर देता है या चुका है और यदि वे उनकी देखभाल करते है तो संपत्ति का हस्तांतरण अनुबंध समाप्त या रद्द हो सकता है। यानी वह संपत्ति फिर से बुजुर्ग के नाम हो जाएगी। इसके बाद वह चाहे तो अपने बच्चों या रिश्तेदार को अपनी संपत्ति से बेदखल भी कर सकते है। साथ ही गुजारा भत्ता परिवार या बच्चों को करना होगा ऐसा निर्णय माननीय कोर्ट द्वारा दिया गया है।
परन्तु यह सच है कि आज भी हमारे देश में बहुत से माता पिता लोक-लाज के डर से अपने बच्चों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करते हैं। उन्हें जमाने की लोक लाज, जमाना क्या कहेगा; बच्चे यदि उनसे दूर हो गए आदि वगैरा। वहीं दुर्व्यवहार, असहनीय पीड़ा को सहते रहते हैं। जानकर हैरानी होगी कि लगभग 30 से 40 प्रतिशत बुजुर्ग ही अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाते हैं। अगर इस समस्या से निजात पाना है तो हमारे बुजुर्गों को अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार के खिलाफ समाज और सरकार में आवाज़ उठानी होगी।
परन्तु में थोड़ा रुकता हूँ और सोचा कि मैने एक पहलू तो देख लिया, दूसरे पहलू पर विचार करना चाहिए और जरूरी भी है कि आज समाज बदल रहा है समय अनुकूल नहीं है परिवर्तन का दौर है घर परिवार का वातावरण बदल रहा है तो मेरा मानना है। थोड़ा सा परिवर्तन बुजुर्गो को भी अपने जीवन की दिनचर्या में लाना चाहिए जैसे कि हठधर्मी, आपसी ताल मेल अपना व्यवहार, सामंजयता आदि में परिवर्तन लाना होगा और आज की युवा पीढ़ी के हिसाब से नए सदस्यों के हिसाब से अपने आप को बदलना होगा अपनी बात को सर्वोपरि ना रखें, अपने परिवार बच्चों के साथ आपसी तालमेल बैठाकर जीवन को यापन करे आज का दौर काफी मुश्किल से भरा है।
परन्तु हमें अपनी संस्कृति हमारे संस्कारों, अपने आचार विचार ओर सम्मान अपने से बड़ों को दे अपने नैतिक मूल्यों को भी समझना है आज की पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है, हमारे ये बुजुर्ग एक स्तंभ है घर का वो बट वृक्ष है जिसकी घनी छाया में रहकर हमे ऊर्जा मिलती है, सकून मिलता है उनकी हर बात कुछ कहती है, उनके आचार विचारों को आत्मसात करे, आत्म मंथन करे, आत्म चिंतन करे,क्योंकि जब हम भी इस इस अवस्था के दौर से गुजरेंगे तब हो सकता है कि हमारे बच्चे भी शायद हमारे साथ ऐसा व्यवहार करें, माता पिता या अपने घर के बुजुर्गों को अपने परिवार के एक कार्यों में सम्मिलित करें जिससे उन्हें भी लगे कि हमारी भी परिवार में अहम भूमिका है यदि कोई संतान अपने मां बाप को साथ रखे और अपने परिवार में कोई भी कार्य ओर अहम निर्णयों में थोड़ी सी उन्हें अहमियत दे और भावात्मक रूप से, सकारात्मक रूप से और रचनात्मक रूप से उनके साथ सम्मिलित होंगे तो मेरा मानना है कि शायद ही वृद्धा आश्रमों की आवश्यकता पड़े। कल हम भी किसी वृद्धाश्रम में पड़े होंगे।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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