धर्म और संस्कार पुरुषार्थ के ही परिणाम हैं-आचार्यश्री
Oct 10 2025
ग्वालियर। पुरुषार्थ से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को प्रयास और संयम से अपने कर्मों से ऊपर उठना चाहिए, विशेष रूप से धर्म के मार्ग पर चलकर। मोक्ष के लिए पुरुषार्थ बहुत ज़रूरी है और यह एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलने से जीवन धन्य होता है, भले ही उसमें कष्ट क्यों न हों। धर्म और संस्कार पुरुषार्थ के ही परिणाम हैं। जब व्यक्ति सही पुरुषार्थ करता है, तो उसके जीवन में धर्म और अच्छे संस्कार आते हैं, जिससे उसका जीवन नियंत्रित और सुखी होता है। यह विचार आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने शुक्रवार को सिरौल स्थित आदित्यपुरम दिगंबर आदिनाथ जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि मनुष्य जीवन पाकर यदि पुण्य पुरुषार्थ नहीं किया, तो जीवन नश्वर है। यह दर्शाता है कि पुण्य के कार्यों में लगे रहना जीवन के लिए आवश्यक है। व्यक्ति को पुरुषार्थ करना चाहिए, पुरुषार्थ का फल अवश्य मिलता है। अच्छे पुरुषार्थ का अच्छा व बुरे पुरुषार्थ का बुरा फल होता है। यदि तत्काल फल न भी मिले तो व्यक्ति धैर्य रखना चाहिए।अपने पुरुषार्थ से आत्म-कल्याण करें और दूसरों के जीवन में भी कल्याण लाने का प्रयास करें, क्योंकि यही जीव का परम लक्ष्य और जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।
आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि दूसरों का कल्याण करने वाले ही सार्थक जीवन जीते हैं, और सत्य के प्रति निष्ठा और आचरण से ही सत्य की अनुभूति हो सकती है। इसके अतिरिक्त, प्रभु, गुरु और माता-पिता के अनुसार जीवन जीने वाला व्यक्ति सदाचारी बनता है और सम्मान पाता है। गलत आचरण, गलत विचार और कड़वी वाणी ही व्यक्ति के दुख का कारण बनती है। किसी भी व्यक्ति को अपनी भावनाओं और आचरण को अच्छा रखना चाहिए, क्योंकि इससे आनंद और शांति मिलती है।
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