अहंकार और लोभ को त्यागने के बाद ही जीवन में शांति संभव है-आचार्यश्री सुबल सागर
Oct 05 2025
ग्वालियर। अहंकार और लोभ को त्यागने के बाद ही जीवन में शांति संभव है। जब तक मनुष्य विषय वासनाओं और भौतिक सुखों के चक्कर में लगा रहेगा तब तक उसे वास्तविक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने रविवार को मुरार स्थित जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य की असली परेशानी यह है कि उसके अंदर संतुष्टि का भाव नहीं रह गया है और भागमभाग में वह तनाव और अवसाद से ग्रस्त होता जा रहा है। इसमें उसकी अपनी कमियां भी जिम्मेवार हैं। सामाजिकता का भाव उसमें रहा नहीं है जिससे उसको परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और वह अपने खुद के बुने जाल में उलझता जा रहा है।आप सभी ने सत्य बोलने के लिए तलाक ले लिया है। इसलिए कभी सत्य नहीं बोलते। सत्य बोलने वाले की कीर्ति दूर दूर तक होती है। उन्होंने कहा कि मोबाइल ने आज झूठ बोलना सिखा दिया है।
आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जब कर्म का तीव्र उदय होता है तो कोई निमित्त काम नहीं करता। जब कर्म बदल जाता है तो सब कुछ ठीक हो जाता है। हम लोगों ने पुराणों में ढेर सारी कहानियां पड़ी है "राजा था रंक बन गया राजपाट खोना पड़ा वापिस पुण्य का योग आया और राजपाट मिल गया। सबके जीवन में जो उतार चढ़ाव है, इसका नियंता मेरा अपना कर्म है इसलिये कभी परिस्थितियों को दोष मत दो उसको विधी का विधान मानकर चलोगे तो आपको प्रसन्नता बनी रहेगी।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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