मनुष्य धर्म के माध्यम से अपने अतीत के कर्मों को बदल सकता है-आचार्यश्री

Oct 03 2025

ग्वालियर। मनुष्य धर्म के माध्यम से अपने अतीत के कर्मों को बदल सकता है, मगर उसे अतीत के कर्म को तो भुगतना ही है। अपने द्वारा किए गए कर्मों की आयु आदमी की उम्र से कई गुना लंबी होती है। लेकिन कर्म सत्ता कहती है जो तूने पिछले भव में जो किया है, वह उदय में आएगा, वो तो भोगना ही है। भगवान कर्म के बंध को नहीं रोक सकते, लेकिन कर्मों को भोगने के लिए समता का गुण विकसित करते हैं। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने शुक्रवार को मुरार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि भगवान ने तुम्हारे कर्मों से कोई छेड़छाड़ नहीं की। समता आ गई तो चित्त परिवर्तित हो जाएगा। धर्म से वर्तमान के कर्मों को बदल सकते हैं, लेकिन अतीत के कर्मो को नहीं है। इसलिए कर्म आंखे खोलकर और भक्ति पूरे जोश के साथ करें। उन्होंने कहा कि बुद्धि है, तो बल है, बुद्धि है, तो समाधान है। बुद्धि जीवन का संचालन करने वाली है। यह मनुष्य को उत्थान की और भी ले जा सकती है और पतन की ओर भी ले जा सकती है। व्यक्ति की जैसी भावना होती है, वैसे ही परिणाम होते है, इसलिए जैसा अपने लिए चाहो, वैसा दूसरों के लिए सोचो। दूसरा हम से अच्छा व्यवहार करे, उससे पूर्व हमें उससे अच्छा व्यवहार करना चाहिए। हम यदि किसी पर कीचड़ उछालेंगे, तो पहले वह हमारे हाथ में ही लगेगा।
आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि कहा कि जो लोग संयम के मार्ग पर चलते हैं सरल स्वभावी होते हैं वह निरंतर प्रगति को प्राप्त करते हैं। हमें कर्मप्रधान होना होगा। कर्मों की प्रधानता ही व्यक्ति को महान बनाती है। कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत रखो, कर्म अच्छे होंगे तो फल भी अच्छा ही मिलेगा जुनून हमें भगवान की भक्ति में रखना होगा। मोक्ष मार्ग में लगाना होगा। तभी जाकर हमारा मार्ग प्रशस्त होगा।जिस प्रकार बीज को सही समय पर बोने, उचित देखरेख करने, सही समय पर काटने पर उचित लाभ मिलता है मंदिर जब छोटा लगने लगे तो उसे तत्काल बड़े मंदिर में परिवर्तित करना आवश्यक होता है। क्योंकि व्यक्ति के मन में धर्म की भावना मंदिर पहुंचने के उपरांत ही आती है