पुलवामा में सीआरपीएफ के 42 जवानों की नृशंस हत्या को खून का घूँट समझकर नहीं पिया जा सकता ण्इस नृशंसता की कीमत भी वसूल करना होगी

Feb 15 2019

पुलवामा में सीआरपीएफ के 42  जवानों की नृशंस हत्या को खून का घूँट समझकर नहीं पिया जा सकता ण्इस नृशंसता की कीमत भी वसूल करना होगी और इसका समुचित जबाब भी देना होगा एये जिम्मेदारी हमारे हुक्मरानों की है क्योंकि वे ही भाग्यविधाता हैं ण्पाकिस्तान संरक्षित आतंकियों द्वारा की गयी इस हत्या पर हम केवल मोमबत्तियां जलाकर या आंसू बहकर बैठ जाएँ तो ये कायरता होगीएहमें यानि देश को इस वारदात का जबाब ठीक वैसे ही देना होगा जैसे ईंट का  जबाब  पत्थर से दिया जाता है ण्
पड़ौसी देश की और से बीते पांच साल में हुए एक दर्जन हमलों में पुलवामा की वारदात समेत हमारे 136  जवान शहीद हुए हैं ण्ये जवान युद्ध करते हुए शहीद हुए होते तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता लेकिन दुर्भाग्य ये है की इन जवानों को बिना लड़े अपनी जान गंवाना पड़ी अधिकाँश जवान या तो कैम्पों पर हुए हमलों में मारे गए या काफिलों पर हुए हमलों में ण्उन्हें मुकाबला करने का अवसर ही नहीं मिला ण्
आतंकियों के हमले नए नहीं हैंएदेश में चाहे जिसकी हुकूमत रही हो ये हमले लगातार जारी हैं ण्2010  का वो हमला भी हमें याद है जिसमें सीआरपीएफ के 76  जवान मारे गए थे बीते तीन दशक में हम देश के 5777  जवानों को बिना लड़े शहीद बना चुके हैं एआखिर ये सिलसिला रुक क्यों नहीं रहा घ्इन हमलों के लिए सियासत को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा ण्हम बीते पांच साल में दुनिया को अपना 56  इंच का सीना खोल.खोल कर दिखाते आये हैं लेकिन हमारे इस वक्ष प्रदर्शन से हमारे दुश्मन डरते ही नहीं ण्उलटे वे और उग्र होकर प्रतिक्रिया करते हैं 
हमारा दुर्भाग्य ये है की हम अपने जवानों की जान की कीमत का मूल्यांकन नहीं कर पातेएयदि कर पाते तो अमरीका की भांति अपने हर जवान की जान कीमत वसूल करते ण्हमारे जवानों की जान भी उतनी ही कीमती होना चाहिए जितनी की अमरीका की नजर में उसके जवानों की होती है ण्दुनिया की राजनीति कुछ भी कहे लेकिन जब मामला देश की सम्प्रभुताएएकता और अखंडता को चुनौती देने का हो तब सरकार को दुश्मन के घर मन घुस कर अपने जवानों की शहादत की कीमत वसूल करना चाहिए ण्ऐसा करते समय पूरा देश सरकार के साथ खड़ा नजर आएगा ण्
दुर्भाग्य ये है की हमारी रक्षा मंत्री संसद में दहाड़ती हैंएसिनेमाघरों में उरी फिल्म देखते वक्त हुंकारा लगातीं हैं लेकिन पुलवामा हमले के बाद उनका मुंह बंद हो जाता हैण् इतनी जघन्य वारदात के बाद देश  के प्रधानमंत्री का चुनावी दौरा स्थगित नहीं होताएगृहमंत्री दौड़े.दौड़े घटनास्थल पर नहीं जा पातेएसारा काम जुबान हिलाकर घिसे.पिटे बयानों से पूरा कर लिया जाता है ण्देश की जनता चौराहों पर मोमबत्तियां जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैएबिना बात सड़कों पर हंगामा करने वालों की भीड़एसंगम में डुबकी लगाने वालों की भीड़ इस नाजुक मौके पर एकजुटता और आक्रोश दिखाने के लिए सड़कों पर नहीं उतरती ण्
पुलवामा के बाद मै अपने टीवी चैनलों पर दुश्मन के खिलाफ वीररस के कवियों की दहाड़ें सुनकर हतप्रभ था ण्बहसें हो रहीं थींएआतंकियों की नृशंसता की तस्वीरें दिखाई जा रहीं थीं लेकिन कोई ये जानने या बताने की कोशिश नहीं कर रहा था की इस जघन्यएवीभत्स और विद्रूप वारदात के बाद हमारी सरकार ने क्या सोचा या क्या करने जा रही हैघ्यानि हमारी भूमिका कागजी शेरों जैसी है एअब समय आ गया है जब हम सब अपनी असल भूमिका को पहचानेएसियासत से ऊपर उठें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सरकार को इस बात के लिए बाध्य करें की वो निर्णायक कदम उठाये ण्
पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों को परिभाषित करने का समय अब नकल चुका हैएअब भारत की और से आर.पार की कार्रवाई की जाना चाहिए ण्अब छिपकर सर्जिकल स्ट्राइक कर उसका ढिंढोरा पीटें का नहीं वास्विक कार्रवाई करने का समय है ण्इस कार्रवाई को चुनाव से सर्वथा अलग रखने का समय है एसियासत तो हम बाद में भी कर सकते हैं 
हमें दुनिया को बताना होगा की तीस साल में हम 22  हजार से ज्यादा आतंकियों को मारकर भी कश्मीर समस्या का निदान नहीं कर सके एइसलिए अब हमें निर्णायक कार्रवाई करना ही होगी और दुनिया को इसमें दखल देने की जरूरत नहीं है ण्अगर ये मसला सिर्फ बन्दूक और बातचीत से हल होना होता तो कब का हल हो चुका होताण्ये मसला अब 1971  जैसी निर्णायक कार्रवाई से ही हल होना सम्भव हैण्ये मेरी निजी राय है ण्अवाम को भी अब अपनी राय उजागर करना चाहिए ण्ण्अवसर आपके हाथ में दो महीने बाद आ ही रहा है ण्