धर्म ही व्यक्ति को इस संसार से तारने वाला साधन है-आचार्यश्री
Sep 27 2025
ग्वालियर। धर्म ही व्यक्ति को इस संसार से तारने वाला साधन है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा धर्म से जुडक़र ही रहना होगा और मिथ्यात्व से हमेशा दूरी बनाए रखना चाहिए। वस्तु के शुद्ध स्वभाव को ही धर्म कहा जाता है, धर्म ही व्यक्ति के पाप रूपी वृक्ष को काटने में कुल्हाड़ी का कार्य करता है। मिथ्यात्व का त्याग कर ही व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होती है और तीर्थ यात्रा करने का फल भी लगता है। जो व्यक्ति राग द्वेष पर जीत प्राप्त कर लेता है और अपने जीवन को राग द्वेष से रहित कर लेता है। वह व्यक्ति विश्व विजयी होता है और अपने जीवन का कल्याण करता है। यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने शनिवार को विनय नगर स्थित दिगंबर महावीर जैन मंदिर मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि जैन धर्म त्याग और संयम की बात करता है। हमारे संस्कार और हमारी संस्कृति की विशेष देखरेख करनी चाहिए, और इसमें सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है हमारा व्यवहार और स्वभाव। धर्म के मार्ग पर चलने के लिए व्यक्ति को अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना आवश्यक है। मृत्यु के बाद व्यक्ति के धन या उसके घर की चर्चा नहीं की जाती, बल्कि उसके स्वभाव से ही उसे याद किया जाता है।
पंचकल्याण पत्रिका विमोचन किया गया
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि विनय नगर के दिगंबर महावीर जैन मंदिर में आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में 11 से 16 नववर तक होने वाले जिनबिम्ब पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव की पत्रिका का विमोचन पंचकल्याणक महोत्सव के पंचकल्याणक पदाधिकारी एवं मंदिर समिति ने सामूहिक रूप से किया। वही 11 नववर होने वाले पंचकल्याणक की जानकारी समाजजनों को दी गई।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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