अग्रसेन के जीवन के अनछुए पहलुओं से परिचित हुए युवा

Sep 01 2025

ग्वालियर। महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य में आने वाले नए व्यक्ति के लिए ऐसा नियम बनाया था कि उसे किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती थी। महाराजा अग्रसेन के राज्य में पहुंचते ही व्यक्ति को जीवन यापन के लिए धन और घर निर्माण के लिए नि:शुल्क सामग्री मिलने लगती थी। 
महाराजा अग्रसेन के राज्य में नियम था कि जो भी कोई नया आए उसे हर घर से एक रुपया और एक ईंट मिले। सरकार भी प्रदेश के हर व्यक्ति के लिए इसी प्रकार से कार्य कर रही है। यह बात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जेयू के अटल सभागार में महाराजा अग्रसेन के जीवन पर आधारित नाटक का शुभारंभ करते हुए कही। महाराजा अग्रसेन के जीवन से युवाओं को परिचित कराने के लिए गत दिवस नाटक का मंचन हुआ। नाटक में कलाकारों का जीवंत अभिनय देख दर्शक हैरान रह गए। नाटक के दौरान बड़ी संख्या में अग्रवाल समाज के युवा उपस्थित थे।
भगवान श्रीराम के वंशज, भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन, शिव के भक्त और देवी महालक्ष्मी के उपासक महाराज अग्रसेन का जन्म प्रतापपुर के महाराज श्री वल्लभसेन के यहां हुआ। महाराज अग्रसेन की माता का नाम भगवती देवी था। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें ताण्ड्य ऋषि के आश्रम में भेजा गया। अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत होकर 14 वर्ष की उम्र में वह वापस आए, उन्हें देखकर देवी भगवती का दिल भर आया। फिर वह अपने पिता के साथ दरबार में आए तो वहां युधिष्ठिर के द्वारा धर्म युद्ध में प्रवेश के लिए वल्लभ सेन को निमंत्रण मिला। अग्रसेन ने अपने पिता से युद्ध में जाने का अनुरोध किया। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह के हाथों वल्लभसेन का वध हुआ।
अग्रसेन ने बाकी के युद्ध में अपनी युद्ध कला का कौशल दिखाया। वापस नगर आने पर प्रतापपुर शोक में डूब गया, उनके चाचा कुंदसेन और उनके पुत्र वज्रसेन ने षड्यंत्र रचा और अग्रसेन को गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया। कारागार के अमात्य ने अपना राजधर्म निभाया और अग्रसेन को कारागार से भगा दिया। जंगल में भटकते अग्रसेन पर कुंदसेन हमला कर उन्हें मारने की कोशिश कर रहे थे। परंतु अग्रसेन अपने चाचा का हाथ काट कर जंगल में गुम हो गए।
जहां उनकी मुलाकात महर्षि गर्ग से हुई। गर्ग ऋषि ने उन्हें शरण दी और उनका मार्गदर्शन किया जिस कारण अग्रसेन 1100 दिवस तक महादेवी लक्ष्मी की एक पैर पर खड़े होकर उपासना करने लगे। देवी महालक्ष्मी ने उन्हें दर्शन दिए। 
गर्ग ऋषि के मार्गदर्शन में इन्होंने आग्रेय रा’य का निर्माण किया। परिणय सूत्र में बंधने के लिए उन्होंने नागवंश में अपना पराक्रम दिखाया। उनके राज्य में खुशहाली थी। शेर और गाय एक ही घाट पर पानी पीते थे। उनके 18 पुत्र और एक पुत्री हुई, तब गर्ग ऋषि ने गोत्र कृत यज्ञ के लिए अग्रसेन को सुझाव दिया। यज्ञ आरंभ हुआ और प्रतिदिन एक ऋषि के द्वारा एक राजकुमार को गोत्र निर्धारण किया गया।
17 दिन रोज एक पशु की बली को देखकर उन्होंने यज्ञ रुकवा दिया और 18 दिन नांगल ऋषि द्वारा नारियल की आहुति देकर नांगल गोत्र निर्धारित कर यज्ञ संपन्न किया और निर्णय किया कि यदि पशु बलि क्षत्रिय धर्म है तो मैं क्षत्रिय धर्म का परित्याग करता हूं और वैश्य धर्म को स्वीकार करता हूं। नाट्य लीला में पाश्र्वगायन पद्मश्री सुरेश वाडेकर और सुरभि गुप्ता ने किया।