पुरुषार्थ से ही भाग्य बनता है, पुरुषार्थ से ही कर्मों का निर्माण होता है-आचार्यश्री
Aug 06 2025
ग्वालियर। पुरुषार्थ से ही भाग्य बनता है, पुरुषार्थ से ही कर्मों का निर्माण होता है। यदि कोई व्यक्ति बुरा सोच सकता है तो वह अच्छा भी सोच सकता है। ये सब भावों के परिणामों का खेल है। ये सब हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम क्या और कैसा सोचें। यदि आपके अंदर गलत चल रहा हैं तो भावों में गलत विचारों की उत्पत्ति होगी और यदि आपके अंदर अच्छा चल रहा है तो भावों में अच्छे विचारों की उत्पत्ति होगी। यदि आपके परिणाम बुरे है तो कर्म बुरे फल देगा और आपके परिणाम अच्छे हैं तो कर्म अच्छे फल देगा। कर्म की मार को कोई झेल नहीं सकता। जिसका भाग्य ही दुर्भाग्य में बदल गया हो उसे कोई क्या मारेगा, उसे तो उसके कर्म ही मारेंगे। यह विचार आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने नई सडक़ स्थित चंपाबाग धर्मशाला मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि हमें सदैव अपने भावों को देखना चाहिए, न कि दूसरे के भावों को। हमारे स्वयं के आचरण से, हमारे स्वयं के भावों से ही हमारा उत्थान होगा, न कि किसी दूसरे के भावों से लेकिन, वर्तमान में सांसारिक प्राणी अपनी कमियों को नहीं देखता, अपने आचरण को नहीं नहीं देखता। वह अपने अवगुणों को नजरअंदाज करते हुए दूसरों के अवगुणों को देखता है, दूसरों के भावों को देखता है। हे! भव्य आत्माओं हमें जो भी परिणाम मिलेगे अपने भावों की परिणीति से मिलेंगे। किसी अन्य के भावों की परिणीति से हमारा कल्याण होने वाला नहीं है।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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