संसारी प्राणी पुण्य करना नहीं चाहता किंतु पुण्य का फल आवश्यक चाहता है:आचार्यश्री

Aug 01 2025

ग्वालियर। भविष्य की चिंता में संसारी प्राणी वर्तमान को खो रहा है। वर्तमान में जीवन जीने का पुरुषार्थ करो क्योंकि भविष्य की चिंता में सुख शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता है। संसारी प्राणी पुण्य करना नहीं चाहता किंतु पुण्य का फल आवश्यक चाहता है। धर्म का श्रमण अच्छी भावना के साथ करना चाहिए। परमारथ की ओर उपयोग हो तो उत्थान हो सकता है। परमार्थ की ओर दृष्टि होनी चाहिए। अर्थ की ओर नहीं।यह विचार आचार्यश्री सुबल सागर महाराज ने  शुक्रवार को नई सडक़ स्थित चंपाबाग धर्मशाला मे धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा किबिना विवेक और विनय के द्वारा की गई भक्ति नुकसानदायक और हानिकारक होती है। पुण्य को बढ़ाना है तो वाणी में विनम्रता जरूरी है। दान किसी भी प्रकार का हो दो सूत्रों में समाहित हो जाता है नहीं तो व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। उन्होंने कहा कि हम नफरत व घृणा पाप से करनी चाहिए पर हम पाप करने से वाले ऐसा करते है। आज का पापी कल धर्मात्मा हो सकता फिर उससे घृणा करके क्या मिल जाएगा। एक गलत कर्म की कितनी बड़ी सजा मिलेगी कोई नहीं जानता। क्रोध, अभिमान, माया व लोभ से गलत कर्म तो हो जाते पर जब इनका भुगतान करना पड़ता है तो स्थिति बड़ी विकट हो जाती है।