एक साधन में विश्वास रखने से ही मन स्थिर रहता है-आचार्य विक्रम

Jun 07 2025

ग्वालियर। सनातन धर्म मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में भगवताचार्य विक्रम महाराज ने अष्टम, नवम और दशम स्कंध की कथा में मत्स्य अवतार, वामन अवतार, समुद्र मंथन, धनवंतरि कथा सुनाते हुए कहा संत होने के लिए घर छोडऩे, कपड़े रंगने की आवश्यकता नहीं है। घर में रहकर गोपियों ने, प्रहलाद ने, कर्मा बाई सहित कई भक्तों ने प्रभु को प्राप्त किया है। 
गेरू कपडे पहनने से कोई सन्त नहीं होता। कपडे बदलने की जरुरत नहीं है। मन को भगवद भक्ति में रंगने की आवश्यकता है। मन के गुलाम मत बनो। मन को अपने नियंत्रण में रखना है। परीक्षित राजा ने मन को सुधारा इसलिए उन्हें शुकदेवजी मिले। जो अपने वास्तविक लक्ष्य को याद रखता है वही सन्त है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य है परमात्मा से मिलन। मन का साक्षी है आत्मा। मन पर हरि नाम का अंकुश रखना है।
मन को मृत्यु का भय दिखाओ तो मन सुधरेगा। मृत्यु के स्मरण से मन सुधरता है। परीक्षित राजा ने जब सुना कि सातवें दिन मरने वाला हूँ,सुनते ही विलासी जीवन का अन्त आ गया। उनको मृत्यु का भय लगा,तो उनका जीवन सुधरा। मृत्यु का दु:ख भयंकर है। जब जीव शरीर छोड़ता है उस समय हजारों बिच्छू एक साथ डंक मारने जैसी वेदना होती है। जन्म दु:खमय है, वृद्धावस्था दुखमय है और हरि भक्ति के बिना अंतकाल भी बड़ा दुखद है। मृत्यु को रोज याद करने से मन निरन्तर भगवत स्मरण में एकाग्र होगा। तब मान लेना कि तुम सन्त हो गए।