कोई के लिए सफलता सबसे बड़ा लक्ष्य, तो कोई संतोष को ही जीवन समझता है:बीके वर्णिका

Jun 04 2025

ग्वालियर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के माधवगंज स्थित प्रभु उपहार भवन में दिल्ली से आई वर्णिका बहन ने कहा, हर व्यक्ति का जीवन अलग होता है, उसके अनुभव, उसके संस्कार, उसकी सोच और उसकी चाहतें भी भिन्न होती है। कोई सफलता को सबसे बड़ा लक्ष्य मानता है, तो कोई संतोष को ही जीवन का सार समझता है। लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं, तो समझ आता है कि जीवन की असली पूंजी दौलत या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि खुशी, संतुष्टि और शांति है। 
ब्रह्माकुमारी लश्कर केंद्र पर वर्णिका बहन ने कहा, ये खजाने बाजारों में नहीं मिलते, ये न किसी चीज से खरीदे जा सकते हैं और न ही किसी को देकर लिए जा सकते हैं। ये खजाने परमात्मा के पास है, और उनका अनुभव तभी होता है जब इंसान स्वयं से जुड़ता है, अपने भीतर झांकता है। हर सफलता के बाद एक नई कमी महसूस होती है।
हर उपलब्धि के साथ एक नया खालीपन जन्म लेता है। और जब उम्र ढलने लगती है, तब जाकर कहीं दिल से एक धीमी आवाज उठती है कि अब कुछ नहीं चाहिए, बस थोड़ा सा सुकून चाहिए, थोड़ा सा प्यार चाहिए, थोड़ी सी शांति मिल जाए। यही वह क्षण होता है जब इंसान को समझ आता है कि असली खजाना बाहर नहीं, भीतर है। 
अनुसुइया दीदी ने कहा, मनुष्य केवल शरीर नहीं है, बल्कि एक चैतन्य शक्ति आत्मा है। यह आत्मा ही शरीर के माध्यम से सभी कर्म करती है। हमारे हर अच्छे या बुरे कर्म का मूल स्रोत हमारी आत्मा ही होती है। शरीर तो एक माध्यम है। जब आत्मा शुद्ध होती है, तो उसके विचार, वाणी और कर्म भी शुद्ध होते हैं। यदि सच्ची कमाई करनी है तो हमें अपनी वाणी को मधुर और प्रेमपूर्ण बनाना होगा। 
इस अवसर पर बीके जीतू, पवन, सुरभि, रोशनी, सुरेन्द्र, विजेंद्र, पंकज, पीयूष, रवि, गजेंद्र अरोरा, डॉ. श्वेता माहेश्वरी सहित ज्योति, बीके प्रहलाद भाई उपस्थित रहे।