अयोध्या का एक अर्थ है जिसको युद्ध में न जीता जा सके

Nov 22 2024

ग्वालियर। सनातन धर्म मंदिर में चल रही संगीतमय राम कथा के चतुर्थ दिवस में कथा व्यास अयोध्या दास महाराज ने कहा अयोध्या का एक अर्थ है जिसको युद्ध में न जीता जा सके। जिसे युद्ध में जीता जाना असम्भव हो। रघु, दिलीप, अज, दशरथ, श्रीराम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम व शक्ति के कारण उनकी राजधानी अयोध्या को अपराजेय माना जाता था। 
अयोध्या का दूसरा अर्थ है अ,युद्ध अर्थात जहां युद्ध ही ना होता हो, हमेशा शांति का राज्य हो वही अयोध्या है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर भी कई वर्षों तक अयोध्या में रहे थे। पांच तीर्थंकरों का जन्म भी अयोध्या में हुआ। ओजस्वी अयोध्या दास ने दशरथ की व्याख्या करते हुए कहा जिसने अपने 10 इंद्रियों को वश में कर रखा हो वही दशरथ है। शरीर रूपी रथ में जुते हुए दस इंद्रियों रूपी घोड़े (पांच कर्मेंद्रियां पांच ज्ञानेंद्रिय) को अपने वश में रखने की योग्यता रखने वाले महापुरुष को दशरथ कहा गया है। उनके इसी गुण के कारण उन्हें पर ब्रह्म परमात्मा के पिता होने का गौरव प्राप्त हुआ था।
श्रीमद्भगवत गीता के तीसरे अध्याय के 41 में शोक में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 10 इंद्रियों को वश में करके दशरथ बनने का उपदेश किया है। इसी प्रकार जो प्रत्येक कार्य में कुशल व प्रवीण हो वही कौशल्या परमात्मा का पालन पोषण करने का महत्वपूर्ण दायित्व निर्वहन कर सकती हैं प्रभु श्रीराम की माता कौशल्या इसी कौशल का प्रतीक है। कौशल्या एवं दशरथ के इसी सद्गुण के कारण इस दंपति को जीवन के चार महापुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के रूप में चार पुत्र रत्न राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न प्राप्त हुए थे। राम साकार रूप में राजा दशरथ के पुत्र होकर भी निराकार परमात्मा स्वरूप में सबके अंदर, नित्य विराजमान हैं। दूसरे पुत्र भरत राष्ट्र के भरण पोषण का दायित्व निभाते हैं, इस कारण वे द्वितीय पुरुषार्थ अर्थ का प्रतीक है। तीसरे पुत्र लक्ष्मण सकल सृष्टि का, जगत का आधार होने के कारण तृतीय पुरुषार्थ काम का स्वरूप है और चौथे पुत्र शत्रुघ्न वितरागी होने के कारण चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष का प्रतीक है।
 कथा के उपरांत मुख्य यजमान श्रीमती कुसुम शुक्ला उनके परिवार एवं भक्तजनों ने आरती उतारी। इसके पश्चात प्रसाद वितरण हुआ।