आनंदित करता है प्रकृति से जुड़ाव: अनिरुद्ध मुरारी

Nov 05 2024

ग्वालियर। जीवन में हम जितना संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहेंगे, जीवन उतना ही आनंदित बना रहेगा,लेकिन आजकल के बच्चे रीयल से ज्यादा रील में रुचि ले रहे हैं और अपनी संस्कृति से कट रहे हैं। माता पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को संस्कृति और प्रकृति से जोड़ें। यह विचार मालवांचल से आए संत अनिरुद्ध मुरारी महाराज ने मंगलवार को बंधन वाटिका में श्री खंडेलवाल धर्मशाला निर्माण समिति द्वारा आयोजित  नरसी का भात (नानी बाई का मायरा) कथा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। कथा से पूर्व सनतान धर्म मंदिर से भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें 81 कलशधारी महिलाएं एवं 3 सैकड़ा श्रद्धालुओं ने शिरकत की। मंच संचालन लवी प्रकाश खंडेलवाल ने किया।
अनिरुद्ध मुरारी ने नरसी की कथा सुनाते हुए कहा कि नरसी भगत ग्रहस्थ संत थे, जो गूंगे पैदा हुए। असमय अपने इकलौते बेटे को खो दिया, फिर भी भगवान के चरणों में उनका अनुराग कम नहीं हुआ। नरसी का मन भगवान की कथा और भजन में ही रमता था। 
नरसी ने अपनी बेटी नानी बाई को सीख दी थी कि वो अपने ससुराल में काम से जी न चुराए। जिस घर के मां-बाप अपनी बेटी को ऐसी सीख देते हैं, उनके बेटियां ससुराल में कभी दुखी नहीं होती हैं। उन्होंने कहा कि आजकल मशीनों का उपयोग कर मनुष्य मशीनी होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि वैसे तो हर दान का पुण्यफल मिलता है,लेकिन कन्यादान सबसे बड़ा दान है। 
महाराज ने कहा कि आजकल के बच्चे झुकना नहीं जानते। किसी के पैर भी छूते हैं तो घुटनों से नीचे नहीं झुकते। ये घुटनों की बीमारी 15 साल से समाज में घुसी है। जितना झुकोगो, जीवन में उतना ही आनंद होगा। भारतीय संस्कृति में चरण छूने की पंरपरा है, घुटने छूने की नहीं। उन्होंने कहा कि अकड़ तो रावण और कंस की भी नहीं रही, इसलिए झुकना सीख ले, झुकना जीवटता की और अकडऩा मृत होने की निशानी है।