हमारी विरासत है यह संगीत विश्वविद्यालय हम सबका फर्ज है इसे सहेजकर रखना: सिंधिया

Oct 21 2024

ग्वालियर। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के तानसेन सभागार में सोमवार को विद्यार्थी सह संवाद कायर्क्रम में छात्रों से रूबरू होते समय केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय हमारी विरासत है और इसे सहजकर रखना हम सबका फर्ज है। इसलिए इस विरासत का बाहरी स्वरूप भले ही दिखने में आधुनिक हो, लेकिन इसकी आत्मा या मूल स्वरूप का जुड़ाव हमारे इतिहास से दिखना चाहिए। निश्चित तौर पर हमारा देश आथिर्क तौर पर मजबूत हुआ है, लेकिन सांस्कृतिक क्षेत्र में भी हम उतने ही मजबूत हुए हैं। जिस तरह तलवार को आग में पकाकर मजबूत किया जाता है, उसी तरह से गायन, नृत्य में भी तपस्या करनी होती है। मंच पर महज चंद मिनटों की प्रस्तुति के लिए कई दिन, कई रात, कई साल लगातार तपस्या करनी होती है। 
टेक्नोलॉजी से महज कुछ ही समय पहले हम रूबरू हुए हैं, लेकिन  संगीत की यह परंपरा कई हजार साल पुरानी है। गायन, वादन, नृत्य स्वयं में एक भाषा है। इसे समझने के लिए कलाकार के साथ दशर्क को भी इसका अभ्यास करना होगा। संगीत में सिंधिया परिवार का योगदान हमेशा से रहा है। महाराज दौलतराव सिंधिया ने जिस तरह ख्याल गायकी के विकास में योगदान दिया, उसी तरह से महाराज जयाजीराव ने भी उस्ताद अमीर खां से सितार सीखा। बैजाताल पर हमने कई सांस्कृतिक महोत्सव कराए। हाल ही में यूनेस्को ने ग्वालियर को संगीत की नगरी मान लिया है तो  यह तय है कि आने वाले समय में सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ यहां की मिट्टी से निकलकर विश्व में नाम करेंगे। इस दौरान उन्होंने संगीत विश्वविद्यालय संबंधी सभी समस्याओं के जल्द हल करने के लिए पूरा प्लान भी भिजवाने की बात की। 
कायर्क्रम से पहले केंद्रीय मंत्री सिंधिया सहित सभी अतिथियों ने फाइनआर्ट विभाग द्वारा लगाई गई कलाकृतियों की प्रदशर्नी का भी अवलोकन किया। कायर्क्रम के दौरान फाइनआर्ट विभाग द्वारा उन्हें कलाकृतियां भी भेंट की गईं। कायर्क्रम की अध्यक्षता कुलगुरू प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने की। 
कुलगुरू प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि ग्वालियर की संगीत परंपरा काफी पुरानी है। जिस तरह राजा मानसिंह तोमर ने गायन की ध्रूपद और धमार शैली को विकसित किया। उसी तरह से सिंधिया परिवार का इस संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने में खास योगदान रहा है। महाराज दौलतराव सिंधिया ने विश्व प्रसिद्ध ख्याल गायकी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह स्वयं लखनऊ जाकर वहां से हस्सू हद्दू खां जैसे कलाकारों को ग्वालियर लेकर आए गायन इस शैली को सिखाने के लिए अन्न छत्र की स्थापना की, जिसमें स्थानीय कलाकारों को नि:शुल्क सिखाया जाता था। इसमें सीखने के लिए भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों ने भी शिरकत की। राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने 1965 में ग्वालियर में संगीत विश्वविद्यालय बनाने की परिकल्पना की थी और उसके लिए 25 लाख रूपये भी स्वीकृत किए थे। यदि वो परिकल्पना साकार रूप लेती तो यह विश्वविद्यालय अब तक 60 वर्ष पूरे कर लेता। 
प्रो. सहस्त्रबुद्धे ने मंच से विश्वविद्यालय के विकास के लिए केंद्रीय मंत्री  सिंधिया से अपील की। उन्होंने विश्वविद्यालय में टेक्नोलॉजी से परिपूर्ण ऑडिटोरियम, आधुनिक स्टूडियो, छात्र-छात्राओं के रहने के लिए छात्रावास और मैन गेट के सामने आरओबी के नीचे वाले स्थान को विश्वविद्यालय को देने की बात शामिल थी।
इस अवसर पर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर, मुन्नालाल गोयल, अशोक आनंद, चंद्रप्रताप सिकरवार, अतुल अधोलिया, प्रो. राकेश कुशवाह, डॉ. आशुतोष खरे, डॉ. अंजना झा, डॉ. मनीष करवड़े, डॉ. संजय सिंह, डॉ. पारूल दीक्षित, डॉ. एसके मैथ्यू, डॉ. गौरीप्रिया, डॉ. श्याम रस्तोगी, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, विनोद शर्मा, विवेक पांडेय, योगेश शर्मा, पीआरओ कुलदीप पाठक सहित विश्वविद्यालय के समस्त शिक्षक, संगतकार कमर्चारी व छात्र- छात्राएं मौजूद रहे। संचालन डॉ. पारूल दीक्षित ने किया।