सीताराम में अनुराग पैदा करता है भरत चरित्र: पं माधव

Oct 19 2024

ग्वालियर। जो भरत चरित्र को आत्मसात कर लेता है, उसका निश्चिततौर पर सीताराम के चरणों में अनुराग हो जाता है। तुलसीदास भी अयोध्याकांड के आखिर में कहते हैं कि भरत का चरित्र नहीं होता तो मेरा सीताराम में अनुराग नहीं होता। यह विचार पं माधव शास्त्री ने माहेश्वरी भवन में आयोजित श्रीराम कथा के छंठवे दिन भरत मिलाप के प्रसंग का सुंदर वर्णन करते हुए व्यक्त किए। इस मौैके पर सिद्धबाबा मंदिर मुरार के महंतजी का पावन सानिध्य रहा। 
पंचायत माहेश्वरी डीडवाना साथ द्वारा आयोजित रामकथा मेें उन्होंने बताया कि भरतजी की स्वभाव सिर्फ एकरस रहता है। भरत की तुलना सिर्फ भरत से ही की जा सकती है। प्रभु चरणों में उनके जैसे प्रेम और त्याग का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। लोग जब थोड़े से लोभ में आकर अपने सगे भाई को नुकसान करने में नहीं हिचकते, जबकि भरत ने अयोध्या का साम्राराज्य मिलने के बाद भी उसे ठुकरा दिया और बिना वन जाए 14 वर्ष तक सन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत किया। कैकयी माता भी भरत का प्रभु चरणों में अनुराग देख हर्षित हो उठी। वे कहती हैं मैं भले की कीचड़ थी, लेकिन मैंने कमल जैसे पुत्र भरत को जन्म दिया है। 
भरत मिलाप की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि राम का भरत से मिलाप देख देवता चिंतित हो उठे। वे ब्रह्माजी के पास पहुंचे और कहा कि कहीं भरत का निवेदन स्वीकार कर श्रीराम अयोध्या वापस नहीं चल दें तो ब्रह्मा उन्हें समझाते हैं कि भरत काम की परछाई हैं और परछाई शरीर के साथ चलती हैं शरीर परछाई के साथ नहीं चलता। भरत राम से कहते हैं कि प्रभु आप संकोच न करें और वही करें जो आपको उचित लगे। 
राम भरत को खड़ाऊं देकर अयोध्या वापस लौटा देते हैं। उपवास को लेकर उन्होंने कहा कि उपवास में फलाहार करें, फुलाहार न करेें,लेकिन हो उल्टा रहा है जिस दिन व्रत रहता है उस दिन खाने में कोई कमी नहीं रहती। उन्होंने कहा कि मित्र और नारी की पहचान संकट में ही होती है। इस अवसर गोविंद पंसारी, दामोदर शर्मा, सुदर्शन झंवर, चंद्रमोहन नागौरी, अजय जाजू, प्रदीप जाजू सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे।