भगवद् गीता में जीवन के प्रश्नों का समाधान

Apr 09 2024

ग्वालियर। भगवद् गीता, हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू को समझाने और समाधान करने के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें दिए गए श्लोकों के माध्यम से, हमें जीवन के हर समस्या का समाधान ढूंढने की दिशा मिलती है। 
एक प्रमुख प्रश्न जीवन में हमें आता है। क्या हमें कर्म करना चाहिए या त्याग करना चाहिए? भगवद् गीता में इस पर आस्था और समझ दोनों की बात की गई है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमें कर्म करते रहना चाहिए, परन्तु उसके फल का आसक्ति में नहीं होना चाहिए। इसमें हमें जीवन के कार्यों को समाप्त करने की भी बात कही जाती है, परन्तु संयोग और अधिकार के अनुसार ही। 
भगवद् गीता में दिए गए श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि जीवन के हर प्रश्न का समाधान हमें स्वयं ढूंढना चाहिए। हमें अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिए।
भूमि शिवहरे ने अपने पोस्टर में कहा कि ईश्वर (ईश्वर), जीव (जीवित इकाई), काल (समय), प्रकृति (प्रकृति), कर्म (क्रिया) कोई नहीं जानता कि समय कहां शुरू हुआ और कहां समाप्त होता है, और केवल समय ही है जो सार्वभौमिक सृजन, रखरखाव और विनाश का रिकॉर्ड रख सकता है। काल भूत, वर्तमान और भविष्य के साथ समय कारक है, और अपने अव्यक्त अवैयक्तिक स्वरूप में सर्वोच्च भगवान का प्रतिनिधित्व करता है। जो कुछ भी जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है, यही भौतिक प्रकृति का नियम है। जैसे ही कोई आदमी होता है।
जन्म लेता है, प्रतिपल मरता है। प्रत्येक जन्मदिन हमारी निश्चित जीवन-अवधि को एक वर्ष कम कर देता है और हमें मृत्यु के करीब ले आता है। ब्रह्मांड में व्यक्ति की स्थिति के अनुसार समय अलग-अलग तरह से गुजरता है। भगवान ब्रह्मा एक सौ वर्षों तक जीवित रहते हैं, लेकिन उनके बारह घंटों में चार युगों (युगों) के एक हजार चक्र शामिल होते हैं। सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। 
द्वितीय वर्ष की छात्रा मुस्कान अग्रवाल ने कहा वद गीता का उद्देश्य है की हम श्री कृष्ण जी के द्वारा दिए गए ज्ञान और शिक्षा को अपने जीवन में ग्रहण करे जो आज के समय हमे और हमारे जीवन को कल्याण करने में सहायता करेगा। हम फल की उपेक्षा न करते हुए कर्म करे क्योंकि जब तक हम कर्म नहीं करेंगे हमें फल नहीं मिलेगा। परिवर्तन संसार का नियम है। जैसे सिक्के के दो पहलू होते है वैसे ही सुख दुख हमारे जीवन के पहलू है। अगर हम दुख में है तो हमें सुख भी अवश्य ही मिलेगा परन्तु हम उस दुख को भूल कर आगे आपने जीवन को व्यतीत करना चाहिए। क्रोध हमेशा हमें मोह के द्वारा होता है इसलिए हम क्रोध में आकर निर्णय नहीं लेना चाहिए और हमेशा शांति से विचार कर कर निर्णय लेना चाहिए। मनुष्य ही स्वयं का शत्रु है और स्वयं का ही मित्र। इसलिए हम स्वयं का और अपने आत्मा का उधर करना चाहिए।
मैकेनिकल की छात्रा श्रुति मिश्रा ने कहा
भागवत गीता में श्रीकृष्ण द्वार आत्मा का जो वर्णन सुनाया गया है इसमें पहला श्लोक है जिस प्रकार मनुष्य वस्त्रों को बदलता रहता है उसी प्राकार आत्मा भी अलग-अलग शरीर बदलती रहती है यह ना कभी जीवित होती है ना ही कभी मरती है जैसे कि हिंदू धर्म के अनुसार 84 लाख योनियां होती हैं और मनुष्य का जन्म लेने के लिए सभी योनियों को पार करना होता है, दूसरा श्लोक यह बताता है कि जिसका जन्म हुआ है उसका मरण तय है और जो मरा है उसका जन्म निश्चित तय है यह एक चक्र है और हमें इस चक्र की चिंता नहीं करनी चाहिए श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें सिर्फ अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और अच्छे कर्म करना चाहिए।
मुस्कान अग्रवाल ने कहा
भगवद गीता का उद्देश्य है की हम श्री कृष्ण के द्वारा दिए गए ज्ञान और शिक्षा को अपने जीवन में ग्रहण करे जो आज के समय हमे और हमारे जीवन को कल्याण करने में सहायता करेगा। हम फल की उपेक्षा न करते हुए कर्म करे क्योंकि जब तक हम कर्म नहीं करेंगे हमें फल नहीं मिलेगा। परिवर्तन संसार का नियम है। विचार से ही मनुष्य बनता है। जैसा वो विचार करता है वैसा ही उसका व्यवहार बन जाता है। क्रोध हमेशा हमें मोह के द्वारा होता है इसलिए हम क्रोध में आकर निर्णय नहीं लेना चाहिए और हमेशा शांति से विचार कर कर निर्णय लेना चाहिए। मनुष्य ही स्वयं का शत्रु है और स्वयं का ही मित्र। इसलिए हम स्वयं का और अपने आत्मा का उधर करना चाहिए।
एक अन्य छात्र राहुल श्रीवास्तव ने कहा- कृष्ण कहते हैं कि नरक की तीन द्वार है वासना क्रोध और लालच यह तीनों के तीनों आत्मा का विनाश कर देते हैं अत: मनुष्य की तीनों को त्याग देना चाहिए, संक्षेप में श्री कृष्ण इस बात पर गौर करते हैं कि वासना क्रोध और लालच को त्याग करने से इंसान में बदलाव आते हैं प्रारंभ में तात्कालिक सुख की ओर आकर्षित होने पर व्यक्ति स्थाई संतुष्टि की तलाश में आध्यात्म को पहचान लेता है यह अहसास उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त करने और अपनी आत्मा को कल्याण की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करता है।
यह पोस्ट एग्जिबिशन भागवत क्लब द्वारा आयोजित की गई थी जिसमें ऋषभ, स्वाति, और नित्या, राधा और अंश की महत्पूर्ण भूमिका रही। 
कार्यक्रम में संस्थान डीन स्टूडेंट वेलफेयर डॉ राजीव कंसल उपस्थित थे। इस कार्यक्रम के संयोजक डॉ चंद्रशेखर मालवी थे। यह जानकारी संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी मुकेश मौर्य ने दी।