खुद को खुद ही आजाद करना तुम...सुकन्या शर्मा

Feb 28 2024

कुछ मांगा नहीं, कुछ चाहा नहीं
बदला बस खुद को, की बिखर न जाए सब कहीं।
आदतों को बदला, चाहतों को बदला
भले मेरे अरमानों ने, अपनी करवट को बदला।
समंदर की एक बूंद, बन जाऊं भले
बस समंदर में, मेरा अस्तित्व तो रहें।
धूल का एक कण भी, में बन न सकी 
मेरे त्याग की, ओझल हो गई छबि।
स्वयं में स्वयं को, खोज न सकी
जीवन के सफर में, जीवन की मंजिल मिल न सकी।
कदम से कदम मिलाकर, साथ चला न कोई
दुनियां की इस भीड़ में, अपना हुआ न कोई
वक्त फिसल रहा है, मुट्ठी से रेत की तरह
चल सको तो चलो, वक्त के साथ वक्त की तरह
निडर बनो, हिम्मत करो 
मतलबी इस दुनिया में, अपना एक मुकाम हासिल करो
जीवन को फूलों की तरह, सुंदर और सुगंधित बनाओं
कीचड़ में रहते हुए भी, स्वयं को कमल की तरह खिलाओ
किरदार इतना, लाजवाब हों
जिससे भी मिलो, उसके पास न कोई जवाब हों
पत्थर भी बनो अगर, तो राह के पत्थर नहीं
उस शिखर के पत्थर, जिसके बिना गगनचुंभी शिखर भी नहीं
अस्तित्व की ये कहानी, रुक न जाए कहीं
लाख भटकाव के बाद भी, रुकना सिर्फ मंजिल पर ही
धधकती ज्वाला सी, नदियों की धारा सी बहना तुम 
कभी धरती तो कभी आसमा, बनकर रहना तुम
मन के किसी कोने में, खुद को जिंदा रखना तुम
पूरा हो सफर जब, खुद को खुद ही आजाद करना तुम।


सुकन्या शर्मा थिंक एंड सपोर्ट फाउंडेशन