मुनि अपनी अंतर आत्मा में रहकर साधना करते हैं-उपाध्यायश्री

Feb 04 2024

ग्वालियर/ डबरा। जैन धर्म में आगम शब्द का प्रयोग जैन धर्म के मूल ग्रंथों के लिए किया जाता है। केवल ज्ञान, मन:पर्यय ज्ञानी, अवधि ज्ञानी, चतुर्दशपूर्व के धारक तथा दशपूर्व के धारक मुनियों को आगम कहा जाता है। यह बात मेडिटेशन गुरु उपाध्यायश्री विहसंत सागर महाराज ने रविवार को महावीर पुर स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैसवाल जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही। मंच पर मुनिश्री विश्वसौम्या सागर महाराज भी मौजूद थे।
उपाध्यायश्री ने आगे कहाकि कहीं कहीं नवपूर्व के धारक को भी आगम माना गया है। उपचार से इनके वचनों को भी आगम कहा गया है। जब तक आगम बिहारी मुनि विद्यमान थे, तब तक इनका इतना महत्त्व नहीं था, क्योंकि तब तक मुनियों के आचार व्यवहार का निर्देशन आगम मुनियों द्वारा मिलता था। जब आगम मुनि नहीं रहे, तब उनके द्वारा रचित आगम ही साधना के आधार माने गए। मुनि अपनी अंतर आत्मा में रहकर साधना करते हैं। 
डबरा नगर के इतिहास में प्रथम बार पंचकल्याण में गजरथ चलेगा, होगे प्रतिमाओं के प्राण संस्कार
उपाध्यायश्री के मीडिया प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि डबरा नगर की चंद्रपुरी काशी नगरी नवगृह शक्ति पीठ शुगर मिल पर मेडिटेशन गुरु उपाध्याय  विहसंत सागर महाराज के मंगल सानिध्य में 10 फरवरी से 15 फरवरी तक होने वाले श्रीचंद्रप्रभु जिनबिम्ब पंच कल्याणक प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में डबरा नगर के इतिहास में प्रथम बार गजराज (हाँथी) भगवान जिनेंद्र के रथ को खीचेगे। डबरा में पंच कल्याण तो हुए है मगर गजरथ नही चल है। इस महोत्सव की तैयारिय बड़ी जोरो के साथ अयोजन पंचकल्याणक महोत्सव समिति के पदाधिकारी कर रहे है। इस महोत्सव में गर्भ कल्याणक से लेकर मोक्ष कल्याणक की गाथा का दृश्य का वर्णन किया जायेगा।