स्वर संस्कार संगीत गुरुकुल एवं रागायन का संयुक्त आयोजन

Jan 29 2024

ग्वालियर। शहर की प्रतिष्ठित सांगीतिक संस्था स्वर संस्कार संगीत गुरुकुल द्वारा रागायन के सहयोग से लक्ष्मीबाई कॉलोनी स्थित सिद्धपीठ श्रीगंगादास की बड़ी शाला में आयोजित संगीत समारोह में सुर-साज के रंग खूब जमे। भगवान दत्तात्रेय की आराधना में सजी यह सुर सभा प्रख्यात गायिका श्रीमती सुलेखा भट्ट के सुमधुर गायन से महक उठी।
सभा का शुभारंभ का सरस्वती एवं भगवान दत्तात्रेय के पूजन से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रागायन के अध्यक्ष एवं सिद्धपीठ श्री गंगादास की बड़ी शाला के मंहत स्वामी रामसेवक दास एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पं. श्रीराम उमड़ेकर ने मां सरस्वती एवं भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर एवं पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। तत्पश्चात गुरुकुल के प्रमुख संजय देवले ने सभी अतिथियों का अंग वस्त्र एवं पौधा भेंटकर स्वागत किया। इस अवसर पर बड़ौदा यूनिवर्सिटी के गायन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश केलकर इंदौर के प्रख्यात तबला वादक विलास सप्रे, अनंत महाजनी, ब्रह्मदत्त दुबे, डॉ. बेनू दुबे सहित बड़ी संख्या में कला रसिक उपस्थिति थे।
सांगीतिक प्रस्तुतियों की शुरुआत स्वर संस्कार गुरुकुल के विद्यार्थियों के समवेत शास्त्रीय गायन से हुई। विद्याथियों में वर्षा भदौरिया, सौम्या शर्मा, अनीषा खत्री, गीतिका वाजवानी, अनुकृति रावत, कंचन दुबे, इशिका थापा, पूजा जैन, संजीवनी पालखे, रेखा सक्सेना, हिमांश गौर, अमनजोत सिंह, आदर्श खेमरिया, लक्ष्य नायक, सुनील कुमार, निखिल कुमार, श्रेष्ठ निरंजन, आकाश जोशी, गोविंद सिंह रंधावा शामिल थे। तबले पर साथ दिया बसंत हरमरकर ने जबकि हारमोनियम पर थी वर्षा मित्रा।
इन विद्याथियों ने तीन प्रात कालीन रागों में प्रस्तुति दी। पहली बंदिश देशकर में थी। बोल थे हूं तो तोरे कारन जागे जबकि दूसरी बंदिश राग विभास में निबद्ध थी। बोल थे आली री जागी में सजनी...। अंतिम बंदिश भूपाल तोड़ी में थी जिसके बोल थे कैसे रिझाऊं अब मन को।  तीन ताल मध्यलय मे सजी इन बंदिशों को विद्यार्थियों ने विविध लयकारियों के साथ इस तरह पेश किया कि रसिक मुग्ध हो गए।
 अगली प्रस्तुति में सभा की मुख्य कलाकार श्रीमती सुलेखा भट्ट का सुमधुर खयाल गायन हुआ। विदुषी डॉ. वीणा सहस्त्रबुद्धे की सुयोग्य शिष्या सुलेखा ने अपने गायन की शुरुआत राग चारुकेशी से की। संक्षिप्त आलाप के साथ उन्होंने इस राग में दो बंदिशें पेश कीं। एकताल में निबद्ध विलंबित बंदिश के बोल थे तुम बिन दीन दयालु जबकि तीन ताल में दु्रत बंदिशे के बोल थे लागी लगन मोरी तुम्हीं संग दोनों ही बंदिशों को सुलेखा ने रागदारी की बारीकियों के साथ बड़े सलीके से पेश किया। राग की सिलसिलेवार बढ़त करने में सुर खिल उठे। 
बहरहाल, कबीर के निर्गुणी भजन मन लागा यार फकीरी में से गायन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भैरवी में साढ़े नौ मात्रा की बंदिश काहे रोकत श्याम डगरिया से अपने गायन का समापन किया। उनके साथ तबले पर डॉ. मनीष करवड़े ने हारमोनियम पर मुकेश पाल ने और वायलिन पर अंकुर धारकर ने बेहतरीन संगत का प्रदर्शन किया।