ज्योतिष से सर्वांगीण सुख-राघव ऋषि

Apr 16 2023

ग्वालियर। मन को सतत सत्कर्म में लगाए रखो नहीं तो मन निठल्ला हो कर पाप करेगा। ये उदगार राघव ऋषि ने सहयोग गार्डन तानसेन नगर में ऋषि सेवा समिति द्वारा आयोजित भागवत कथा के तृतीय दिवस व्यक्त किए। इस अवसर पर केंद्रीय नागरिक एवं उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश सरकार के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर संत कृपाल सिंह ने व्यासपीठ से आशीर्वाद लिया। 
इस अवसर पर राघव ऋषि ने सिंधिया परिवार से पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए स्व राजमाता सिंधिया की स्मृति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सिंधिया परिवार रियासतकाल से ही धार्मिक रहा है। मेरे पिता जब स्व जीवाजी की स्मृति में कथा सुनने ग्वालियर आए थे तो मैं भी उनका साथ था, राजमाता सिंधिया नित्य उसी स्थान पर आती थी जहां हम ठहरे थे और जानकारी लेती थी कि किसी प्रकार की कोई परेशानी तो नहीं है उन्हें के परिवार के ज्योतिरादित्य सिंधिया भी केंद्रीय मंत्री होने के बाद भी अति व्यस्त समय में ऐसे भी कथा भागवत में आने के लिए समय निकालते हैं। ये बड़ी बात है।
 अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ-साथ मंत्र, ग्रन्थ, कन्त व सन्त भी होने चाहिए जिससे सर्वांगीण कल्याण व विकास मिलता है। सृष्टि का नियन्त्रण करने के लिए मृत्युलोक में भगवान ने अपने सात प्रत्यक्ष ग्रह रूपी पार्षदों को नियुक्त किया है जो प्रतिक्षण मनुष्य को संचालित करते है। चन्द्रमा के करीब आने पर निर्जीव जल भी ज्वार-भाटे के रूप में आन्दोलित हो जाता है तो सजीव मनुष्य क्यों नहीं होगा। सूर्य से आत्मतत्व, चन्द्रमा से मन,मंगल से सत्व रजसतत्व बुध से वाणी, बृहस्पति से प्रज्ञा व ज्ञान, शुक से धन व भौतिक संसाधन एवं शनि से सुख व दु:ख नियंत्रित होता है। जिव यदि धर्म की  मर्यादा में रहकर जीवन यापन करता है तो उसे सुख व अन्त में स्वर्ग में प्राप्ति होती है।    
कथाक्रम को आगे बढ़ाते हुए ऋषि उन्होंने कहा कि मन का विश्वास मत करो। यह बड़ा विश्वासघाती है। उसे अंकुश में रखो। अजामिल प्रसंग की चर्चा करते हुए बताया कि अजा का अर्थ है माया और माया में फंसा हुआ जीव ही अजामिल है। एक वैश्या को देखने के बाद उसका मन दूषित हो गया। पाप प्रथम आँख द्व्रारा ही होता है। आँख बिगड़ी कि मन बिगड़ा और मन बिगड़ा तो जीवन बिगड़ा। सन्तों के कहने पर उसने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा। अन्तकाल में उसने यमदूतों से डरते नारायण-नारायण पुकारा, उसका नारायण नहीं आया किन्तु विष्णुदूत आ गए। अंगारे पर जाने या अनजाने पर पैर पड़ जाए तो अंगारा जलाता है। अन्त में वह भगवान के धाम में गया।
कथा के अन्त में मुख्य यजमान ज्योति दिनेश सिकरवार कथा संयोजक रामबाबू अग्रवाल, आनंद मोहन अग्रवाल, उमेश उप्पल, संतोष अग्रवाल, संजय शर्मा, अंबरीश गुप्त, हरिओम मिश्र, देवेंद्र तिवारी बलवीर परमार सहित अनेक गणमान्य भक्तों ने प्रभु की भव्य आरती की।