वकीलों ने अपनी हड़ताल को दो दिन और बढ़ाया

Mar 28 2023

ग्वालियर। बार और बैंच के बीच टकराव और बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। 25 प्रकरणों की प्रत्येक कोर्ट द्वारा तीन माह में सुनवाई कर उनका निराकरण करने के आदेश को अव्यावहारिक बताते हुए हड़ताल पर गए अधिवक्ताओं पर उच्च न्यायालय द्वारा शुरु की गई आपराधिक अवमानना की कार्रवाई के बाद मामला और उलझ गया है। अधिवक्ताओं ने अपनी हड़ताल को दो दिन के लिए और बढ़ा दिया है। इस टकराव से पक्षकार सर्वाधिक परेशान है। वकीलों की हड़ताल से न्यायिक प्रक्रिया के थमने से न्यायालयों पर प्रकरणों का बोझ और बढ़ेगा। मंगलवार को कलम बंद हड़ताल के बाद अधिवक्ता आज बुधवार 29 मार्च से धरना प्रारंभ करेंगे।
बार काउंसिल के अध्यक्ष बनते ही प्रेम सिंह भदौरिया ने चेतावनी दे दी थी कि अगर उच्च न्यायालय ने 25 प्रकरणों के तीन माह में निराकरण के आदेश को वापस नहीं लिया तो वे हड़ताल पर चले जाएंगे। इसके साथ ही 23 मार्च से 25 मार्च तक की हड़ताल घोषित की गई थी। हड़ताल के दूसरे दिन 24 को हाईकोर्ट ने इस हड़ताल पर स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रकरण की सुनवाई करते हुए अधिवक्ताओं को काम पर आने को कहा, साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर अधिवक्ता काम पर नहीं आए तो उन पर न्यायालय के आदेश की अवमानना की कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जितेन्द्र माहेश्वरी ने बार काउंसिल की टीम को दिल्ली में इस अवरोध को दूर करने के लिए बुलाया था, लेकिन यहां भी बात नहीं बनीं। 
जस्टिस माहेश्वरी ने सभी से कहा कि वे काम पर लौटे, कोई रास्ता निकलेगा। इसके बाद वकील वापस आ गए और एक दिन की हड़ताल और घोषित कर दी। इस हड़ताल के दौरान उच्च न्यायालय ने बार काउंसिल के निर्वाचित अध्यक्ष सहित सभी 25 सदस्यों पर अपराधिक अवमाानना का मामला दर्ज कराया। इस आदेश से वकील नाराज हैं। अधिवक्ताओं ने फिर बैठक की और दो दिन और हड़ताल पर जाने की घोषणा कर दी।
राज्य अधिवक्ता परिषद द्वारा हड़ताल का आह्वान करने के बाद जो अधिवक्ता न्यायालयों में पैरवी के लिए उपस्थित हो रहे हैं, उनकी जानकारी परिषद द्वारा मंगाई जा रही है। इन सभी अधिवक्ताओ नोटिस जारी किए जाएंगे। महाधिवक्ता द्वारा सभी सरकारी अधिवक्ताओं को पैरवी करने के निर्देश देने के बाद कई अधिवक्ता न्यायालय में पैरवी के लिए उपस्थित हो रहे हैं। 
हम चर्चा के लिए तैयार
अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष प्रेम सिंह भदौरिया ने कहा कि बार काउंसिल शुरुआत से ही चर्चा के जरिए समस्या का निराकरण करने के पक्ष मे रही है, लेकिन इस मामले में चर्चा करने के बजाय जिस तरह के आदेश दिए जा रहे हैं इसमें वकीलों की भावनाएं आहत हो रही हैं। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय को उनकी जायज मांग मान लेनी चाहिए। 25 प्रकरणों के तीन माह में निराकरण करने से पक्षकारों को न्याय नहीं मिल रहा है। इसलिए यह आदेश वापस लिया जाना जरुरी है।