संतोष की जिंदगी में पुण्य-पाप और कर्म की सत्ता में विश्वास रखना- गणिनी आर्यिकाश्री

Jan 16 2023

ग्वालियर। सुख की कामना प्रत्येक मनुष्य में होती है लेकिन सुख की परिभाषा प्रत्येक के लिए अलग-अलग होती है। कोई ज्यादा धनवान होने को सुख मानता है, कोई स्वस्थ शरीर को सुख मानता है। किसी के लिए सुख के मायने मान-प्रतिष्ठा है, तो किसी के लिए रूप-सौंदर्य से बढक़र कुछ भी नहीं किसी को धर्म-आराधना में आनंद की प्राप्ति होती है, तो कोई दूसरों को परेशान करने में खुश होता है। फिर भी सुख को हासिल करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति तरह-तरह के पुरुषार्थ करता है। यह बात गणिनी आर्यिकाश्री आर्षमति माताजी ने सोमवार को उपनगर लोहामंडी स्थित दिगंबर लाला गोकुलचंद जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
गणिनी आर्यिकाश्री ने कहा कि संतोष की जिंदगी जीना, वर्तमान में ही जीना, जो है उससे काम चला लेना। जितना है उतने में संतोष रखना। जो मिला खा लिया, भविष्य की चिंता न करना। जो नहीं है उसकी परवाह न करना, पुण्य-पाप और कर्म की सत्ता में विश्वास रखना। आज हर मनुष्य दुखी है क्योंकि वह अभाव में जीता है। वह अभाव की, असंतोष की जिंदगी जीने का आदी है। जो-जो उसके पास होता है वह उसकी परवाह नहीं करता उसके प्रति लापरवाह बन जाता है लेकिन जो उसके पास नहीं होता उसे पाने के लिए दिन-रात एक कर देता है, उसकी रातों की नींदें खो जाती हैं, दिन का अमन-चैन खो जाता है और उसे जब इच्छा की गई वस्तु पुण्य की कमी से नहीं मिलती, तब वह हताश हो जाता है, निराश हो जाता है, दुखी हो जाता है। पुण्य और पाप के उदय को नहीं सोचता है। 
नशेबाज आदमी अपने धर्म, धन और तन तीनों को ही खो डालता है
गणिनी आर्यिकाश्री आर्षमति माताजी ने कहा कि नशेबाज आदमी अपने धर्म, धन और तन तीनों को ही खो डालता है इसलिए हमारे महर्षियों ने इसे दुव्र्यसन बताया है। गणिनी आर्यिकाश्री ने कहा भांग, तंबाखू, शराब, गांजा आदि वस्तुओं को निर्लज्ज हो स्वीकार करने वाला मानव बुद्धि विकार, परवशता और अत्यंत दीनता प्राप्त करता है इसलिए तो इन मदकारी पदार्थों से मत्त हो जाता है वह धन्य नहीं अर्थात निन्द्य है।