पं व्यकटेश कुमार की गायकी के माधुर्य में डूबे रसिक...

Dec 20 2022

 सर्द खुशगवार मौसम,  बासंती बयारों पर सवार सुरों से सजी शास्त्रीय संगीत की महफ़िल, मूर्धन्य संगीतज्ञ पं व्यंकटेश कुमार की मंत्रमुग्ध करती तानें, हवा में तैरती सुमधुर स्वरलहरियां और आंखें मूंदे  मधुर रसपान करते सुधीय श्रोतागण। यहाँ बात हो रही है संगीत शिरोमणि तानसेन की याद में आयोजित हो रहे शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रतिष्ठित महोत्सव विश्व संगीत समागम " तानसेन समारोह" में मंगलवार को सजी सांध्यकालीन सभा कीसमारोह में दक्षिण भारत के विश्व प्रसिद्ध  चेन्नकेशव मंदिर के थीम पर बने भव्य एवं आकर्षक मंच पर आसीन होकर दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक के धारवाड़ से पधारे विश्व विख्यात शास्त्रीय गायक पं वेंकटेश कुमार अपनी भावमय एवं सुरीली आवाज में मीठी-मीठी राग रागनियों की  सरिता बहा दी। उन्होंने आकर्षक राग " यमन कल्याण" को अपने गायन के लिए चुना। वेंकटेश जी ने जब अपनी बुलंद आवाज में इस राग और एक ताल में निबद्ध बड़ा ख्याल " पट तोरे कवन.." गाया तो गुणीय रसिक वाह वाह कहे बिना न रह सके। उन्होंने तीन ताल में पिरोकर  छोटा ख्याल " हरवा मोरा देव.." गाकर रसिक श्रोताओं को घरानेदार गायिकी के सम्मोहन में बांध लिया। उनके गायन में राग यमन कल्याण की सभी विशिष्टताएँ साफ झलक रहीं थींग्वालियर व किराना घराने की गायकी में सिद्धहस्त पं व्यंकटेश जी के गायन में राजसी आलाप ने विलंबित और द्रुत का अनुसरण कर रसिकों की मनोदशाओं को अपने अनुकूल बना लिया। फिर उन्होंने  राग " गौड़ मल्हार" में विलंबित तीन ताल में निबद्ध बड़ा ख्याल "काहे हो. ." एवं मध्यलय तीन ताल में छोटा ख्याल " बलमा बहार आये माँ.." पेश कर गुणीय रसिकों को विशुद्ध शास्त्रीय गायिकी की बारीकियों व सौंदर्य बोध से परिचित करा दिया। उन्होंने राग "तिलक कामोद" में भी एक बंदिश "डमरू डम डम बाजे" का गायन किया और प्रसिद्ध भजन " नाम जपन क्यों छोड़ दिया" सुनाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। इसी के साथ उन्होंने अपने गायन को विराम दिया। शास्त्रीय संगीत पसंद करने वाले रसिकों को मंगलवार  की यह शाम लंबे अरसे तक याद आती रहेगी। 

पंडित जी के  गायन में तबले पर श्री केशव जोशी, हारमोनियम पर डॉ विनय मिश्रा और सारंगी पर उस्ताद आबिद हुसैन ने दिलकश संगत की।