गंगादास की शाला में बलिदानी संतों के शस्रों का पूजन किया

Oct 05 2022

ग्वालियर। दशहरे पर गंगादास की बड़ी शाला में दशहरा पर 700 साल पुरानी तोप से गोले दागकर संतों के शस्त्रों का पूजन किया। इस तोप की मदद से महाराज गंगादास ने साधु-संतों के साथ वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की पार्थिव शरीर को बचाने के लिये अंग्रेजों की फौज से लोहा लिया था। और रानी के पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार होने तक गंगादास की शाला में घुसने नहीं दिया था। विजयदशमी पर इन्हीं शास्त्रों का पूजन किया जाता है, जिनके प्रहार से अंग्रेजों की फौज भी कांप उठी थी। वीरांगना के पार्थिव शरीर की रक्षा करने के लिए राष्ट्र भक्त 745 साधु-संतों ने अपने प्राणो का आहूती दी थी।
गंगादास की बड़ी शाला रामानंदाचार्य संप्रदाय की प्रमुख पीठों में से एक है। यह निर्मोही निर्वाणी और दिगंबर अखाड़ों की पूरण वैराठी द्वाराचार्य पीठ है। वर्तमान में गंगादास की शाला के प्रमुख महंत स्वामी रामदास महाराज हैं। गंगादास की बड़ी शाला के संतों का प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बड़ा योगदान हैं। झांसी से अंग्रेजों की फौज का मुकाबला करते हुये वीरांगना यहां पहुंची थी। यहां गंगादास की शाला के पास अंग्रेजों ने घेरकर घायल कर दिया था। घायलावस्था में रानी अपने गुरू गंगादास महाराज के पास पहुंची। और उनसे वचन लिया कि मेरी मृत देह किसी सूरत में पापी अंग्रेजों के हाथ नहीं आनी चाहिये। गंगादास की शाला को अंग्रेज सेना ने चारों तरफ से घेर लिया। और अंदर घुसने का प्रयास किया। शाला में मौजूद नागा संतों ने अपने परंपरागत हथियार तलवार, पटा, बरछी व चिमटों से अंग्रेजों का मुकाबला किया। अंग्रेज सेना ने एक खिड़की में से शाला के अंदर घुसने का प्रयास किया।
महंत रामदास महाराज ने अकबर द्वारा उपहार स्वरूप दी गईं तोप को खिड़की पर लगाकर साधु-संतों ने फिरंगियों की सेना को रानी के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार होने तक रोके रखा था। इसी ऐतिहासिक तोप से गोले दागकर अपने प्राणों की आहूति देने वाले संतों को सलामी देने के साथ उनके शस्त्रों का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। बुधवार को दोपहर 12 परंपरागत रूप से गंगादास की बड़ी शाला में शस्त्रों का पूजन हुआ और इस मौके पर संत अपने हथियार चलाने के कौशल का प्रदर्शन भी किया गया।