ब्रह्मचर्य हमें सदाचरण और सामाजिक संस्कृति की सीख देता है-मुनिश्री विनय सागर

Sep 09 2022

ग्वालियर। उत्तम ब्रह्मचर्य हमें सदाचरण और सामाजिक संस्कृति की सीख देता है। स्वयं में निवास करना आत्मा की पहचान करना ब्रह्मचर्य है, सबसे कठिन तप है ब्रह्मचर्य, सबसे बड़ी साधना है ब्रह्मचर्य, ब्रह्मचर्य की साधना तन से बाद में होती है, मन से पहले करनी होती है। केवल विषयों को छोडऩा ही नहीं है, ब्रह्मचर्य में लीन भी होना है। ब्रह्मचर्य जो हमारी साधना का मूल है, सभी साधनाओं में ब्रह्मचर्य को सबसे प्रमुख स्थान दिया गया है। ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करने से शक्ति का संचार होता है। पांच पापों को त्याग करने से महाव्रत हो जाएगा। 
यह विचार पर्यूषण पर्व के दसवें दिन शुक्रवार को उत्तम ब्रह्मचर्य एवं जैन धर्म के 12 वें तीर्थंकर भगवान वासपूज्य के मोक्ष कल्याणक निर्वाण महोत्सव पर श्रमण मुनिश्री विनय सागर महाराज ने माधवगंज स्थित चातुर्मास स्थल अशियाना भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्म का अर्थ आत्मा है और आत्मा के समीप रहना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म है। संसार के भोगविलास में जितना मनुष्य फंसता है और अपना विषय वासनाओं की पूर्ति के लिए भाग-दौड़ मचाता है उतनी ही वह अपने आत्मा से दूर होता जाता है। आत्मा में अनंत शक्ति है। आत्मा के माध्यम से ही कल्याण हो सकता है। शरीर और इंद्रियों से यह संभव नहीं है।