भुजरिया विसर्जन के साथ महिलाओं ने दी सावन को विदाई
Aug 13 2022
ग्वालियर। रक्षाबंधन पर्व के दूसरे दिन भुजरियों को विसर्जन के लिए नगर की जीवनदायिनी कही जाने वाली पार्वती नदी और सिंध नदी के तट पर ले जाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं अलग-अलग समूह में सिर पर भुजरियों को रखकर भक्ति गीत गाते हुए नदी के किनारे पहुंची। उसके बाद पूजा कर भुजरियों का विसर्जन करते हुए सतरंगी सावन को विदाई दी गई। वही कई महिलाओं ने अपने घर खलियान इत्यादि में सखियों के संग झूला झूल कर सावन के गीत भी गाए।
भुजरिया विसर्जन कार्यक्रम स्थलों पर सतरंगी परिधानों से सुसज्जित महिलाएं अपने-अपने समूह में जगह जगह खड़ी दिखाई दी। नगर और कस्बों में जगह-जगह परंपरागत तरीके से नदी, तालाब इत्यादि पर पहुंचकर सुरक्षित तरीके से भुजरियों का विसर्जन किया। हालांकि एसडीएम अश्वनी कुमार रावत के मार्गदर्शन में भुजरिया विसर्जन के चिन्हित स्थानों पर पुलिस प्रशासन के पुख्ता इंतजाम के अलावा होमगार्ड की रेस्क्यू टीम स्थानीय गोताखोरों के साथ तैनात दिखी। महिलाओं ने गेहूं और जौ की बालियां भुजरियों को कानों में लगाकर एक दूसरे को पर्व की परंपरा में बांधा। जहां नगर में भुजरिया विसर्जन को लेकर पार्वती नदी पर चारों ओर महिलाएं ही महिलाएं भुजरिया विसर्जन करने पहुंचीं। भुजरियों के विसर्जन मेला को देखने के लिए बच्चे, बूढ़े, जवान सभी लोग पार्वती नदी पर पहुंचे। महिलाओं ने पार्वती नदी में भुजरियों का पूजन इत्यादि कर विसर्जन किया और भगवान भोलेनाथ को भुजरिया अर्पित करते हुए शाम के समय सड़क के दोनों ओर कतार लगाकर खड़े लोगों को महिलाओं ने भुजरिया भेंट की इस दौरान छोटे-छोटे बच्चों ने बड़ों को जहां भुजरिया भेंट की।
ग्वालियर में कटोराताल में नहीं हो सकीं भुजरिया विसर्जित, टूटी परंपरा
शहर में त्योहारों पर वर्षों से चली आ रही भुजरिया विसर्जन की परंपरा इस बार संगीतमयी फव्वारे के कारण टूट गई। हर वर्ष कटोराताल में भुजरियों का विसर्जन किया जाता है। यहां नगर निगम की ओर से विसर्जन के लिए अलग से टैंक रखा गया है, लेकिन इस टैंक तक पहुंचने के लिए महिलाओं से 30-30 रुपए के टिकट कटाने के लिए कहा गया। इसके चलते महिलाएं गुस्से में नाले में ही भुजरियां विसर्जित कर चली गईं। कई महिलाओं ने वापस घर लौटकर भुजरियों का विसर्जन किया। हालांकि कटोराताल में बाहर मेला जैसा माहौल था। झूले व चाट-पकौड़ी के ठेले जरूर लगे थे।
भुजरियों की बालियां भगवान के चरणों में अर्पित कीं और उसके बाद एक दूसरों को बालियां देकर मंगलकामना की। बड़ों को भुजरियां देकर उनका आशीर्वाद लिया और छोटों को गले लगाकर उन्हें आशीष दिया। महिलाओं व बच्चियों ने बड़ों को भुजरियां देने पर उपहार सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा भी दी। सागरताल में वहां आसपास रहने वाली महिलाओं ने भुजरिया विसर्जित कीं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरियों का उत्सव धूमधाम के साथ मनाने की परंपरा है। इस दिन महिलाएं सिर पर भुजरियां रखकर पास के तालाब व सरोवर पर सावन के मंगल गीत गाते हुए जाती हैं और भुजरियों को तोड़कर अर्पित करती हैं। कुछ भुजरियों को तोड़कर एक दूसरे को बांटने के लिए ले आती हैं। भुजरियों की कुछ बाली देकर शुभकामनाएं देने के साथ कन्याएं व महिलाएं मंगलकामना करती हैं। भुजरिया ग्रहण करने के बाद व्यक्ति कुछ दान-दक्षिणा महिलाओं व कन्याओं को देते हैं।
कटोराताल पर किया जाता था भुजरियों का विसर्जन
प्रतिवर्ष भुजरियों का विसर्जन कटोराताल के छोटे कुंड में किए जाने की व्यवस्था की जाती है। कटोराताल में प्रवेश शुल्क लगने के कारण इस बार भुजरियों का विसर्जन वहां नहीं हो सका। इससे पहले दो साल कोरोना संक्रमण के कारण भुजरियों का मेला नहीं लगा था। कटोराताल पर परंपरागत रूप से मेला जरूर लगा था। मेडिकल कालेज के पास झूले लग गए थे और चाट-पकौड़ी के ठेले भी सजे थे। महिलाएं शाम के समय भुजरियों के मेले में पहुंचीं, जहां झूलों का आनंद लिया।
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