अब सभापति के लिए जोड़-तोड़ शुरू, भाजपा-कांग्रेस की निगाहें निर्दलीयों पर
Jul 19 2022
ग्वालियर। नगर निगम चुनाव के नतीजे आने और महापौर-पार्षदों के चेहरे व संख्या की तस्वीर साफ होने के बाद अब भाजपा-कांग्रेस में सभापति को लेकर जोड़तोड़ शुरू हो गई है। मेयर को कांग्रेस की बन गई हैं, लेकिन परिषद में भाजपा की संख्या ज्यादा है। पर निर्दलीय इस लड़ाई में निर्णायक साबित हो सकते हैं। कांग्रेस ओवीसी सभापति का कार्ड खेल सकती है। इनमें विनोद यादव माटू, पूर्व मंत्री लाखन सिंह की बहू उपासना संजय यादव, मेयर के पति सतीश सिकरवार के खास अवधेश कौरव के नाम सबसे ऊपर हैं।
वहीं भाजपा की बात करें तो इस चुनाव में वैश्य (बनिया) समाज का पूरा वोट आप को जाने पर भाजपा को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। यही कारण है कि भाजपा संजय सिंघल का नाम देकर वैश्य सभापति का कार्ड खेल सकती है। मेयर और पार्षद शपथ लेने के बाद सबसे पहले सभापति का चुनाव होना है। उसके बाद मेयर इन काउंसिल बनेगी।
महापौर और पार्षदों का परिणाम आने के बाद अब भाजपा और कांग्रेस में सभापति को लेकर जोड़तोड़ शुरू हो गई है। जहां भाजपा 34 पार्षदों के साथ बहुमत के करीब है। वहीं कांग्रेस का संख्या बल अभी 28 (आशा सुरेंद्र चौहान के शामिल होने और समर्थित प्रत्याशी दीपक मांझी और नाथूराम ठेकेदार को शामिल कर) तक पहुंचा है। ऐसे में पार्टी के नेता बहुजन समाज पार्टी के एक पार्षद और दो से तीन निर्दलीयों सहित सत्तापक्ष के पार्षदों पर भी दांव खेलने की तैयारी कर रहे हैं। ताकि अपनी पार्टी का सभापति बनाकर वे परिषद में भी वर्चस्व स्थापित कर सकें। वहीं, पार्षदों की संख्या में सबसे बड़े दल भाजपा में दो से तीन निर्दलीय और शामिल होने की अटकलें चल रही हैं। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा परिषद के अंदर बहुमत के जादुई आंकड़े से ज्यादा सदस्य लेकर बैठेगी इस स्थिति में मेयर- इन-काउंसिल के द्वारा भेजे गए प्रत्येक प्रस्ताव पर परिषद में अड़ंगे लगते रहेंगे।
मतदाताओं के तेवर से गड़बड़ाए समीकरणों के कारण इस बार परिषद में बहुमत होने के बाद भी भाजपा विपक्ष में बैठेगी। हालांकि महापौर और एमआईसी के साथ साा में बैठने वाली कांग्रेस को परिषद में आने वाले प्रत्येक बिंदु को पास कराने के लिए भाजपा का मुंह तकना पड़ेगा। हालांकि इस मामले को लेकर भ्रम की स्थिति है। सदन में बहुमत होने के कारण परिषद में सत्ता भाजपा की मानी जाएगी, बावजूद इसके कि महापौर कांग्रेस का है। उनके अनुसार इसको लेकर निगम विधान में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। परिपाटी के अनुसार महापौर और उनका मंत्रिमंडल सत्ता में माना जाएगा।
लोकसभा और विधानसभा की तरह नगर निगम परिषद में दलबदल विधेयक लागू नहीं है। इस कारण यहां पार्षदों को दूसरे दल का साथ देने में कोई खतरा नहीं है। चूंकि महापौर डॉ. शोभा सिकरवार और उनके पति विधायक डॉ. सतीश सिकरवार लंबे समय तक भाजपा में ही रहे हैं। इसके साथ ही पिछली 3 बार से उनकी उपस्थिति परिषद में भी है। ऐसे में वे अपने संबंधों के आधार पर भाजपा के पार्षदों को तोड़ सकते हैं। भाजपा अपने 34 पार्षदों के अलावा बागी और निर्दलीय पार्षदों को अपने साथ लेने की जोड़तोड़ कर रही है ताकि सदन में पर्याप्त बहुमत के साथ बैठ सके।
शपथ की तैयारियां शुरू
आठ साल बाद नगर की नई सरकार चुनी जा चुकी है। अब जल विहार के नगर निगम परिषद कार्यालय में एक बार फिर से रौनक लौटेगी। बस थोड़ा इंतजार शपथ ग्रहण का करना होगा। जिले के कलेक्टर और जिला निर्वाचन अधिकारी कौशलेंद्र विक्रम सिंह महापौर और पार्षदों को इस बार एक समारोह में शपथ ग्रहण कराएंगे। हालांकि अभी शपथ ग्रहण समारोह के लिए तारीखका तय होना शेष है। नगरीय निकाय चुनाव का रिजल्ट आने के बाद निगम परिषद में महापौर की भूमिका में कांग्रेस की शोभा सिकरवार होगीं। वहीं 66 वार्डों में भाजपा, कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी और निर्दलीय पार्षद रहेंगे। अभी इनका गजट नोटिफिकेशन होगा।
महापौर-पार्षद के 365 में से 207 की जमानत नहीं बची
नगर निगम महापौर और 66 वार्ड में पार्षद पद के 365 उमीदवारों में से 207 जमानत भी नहीं बचा सकें हैं। बाकी रहे 158 उमीदवारों में से 67 ने जीत हासिल की है और बाकी 91 जमानत बचाने में कामयाब हुए हैं। वहीं आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी रूची गुप्ता भी अपनी जमानत बचाने में कामयाब नहीं हो पाई।
कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने कहा कि जमानत बचाने के लिए प्रत्याशी को उसके वार्ड या क्षेत्र में डले वोटों के छंटवे हिस्से के बराबर या इससे अधिक मत मिलना चाहिए। यदि इससे कम वोट मिलेंगे तो जमानत जप्त जैसी स्थिति बनती है।
रविवार रात जारी परिणाम के मुताबिक सबसे कम वोट वार्ड 36 से निर्दलीय प्रत्याशी रामकली माहौर को 11 मिले हैं। वार्ड 54 के प्रत्याशी निरंजन सिंह को 12 तथा वार्ड 24 के हरविलास कुशवाह को 13 वोट मिले हैं। सभी 66 वार्ड में कुल 25 प्रत्याशियों ने चुनाव में पैसा तो खूब खर्च किया और प्रचार भी घर-घर किया पर वे 50 से अधिक वोट हासिल नहीं कर सके हैं।
संपादक
Rajesh Jaiswal
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