पारंपरिक ढंग से हरिकथा, मिलाद और चादरपोशी के साथ तानसेन समारोह शुरू

Dec 26 2021

ग्वालियर। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण महोत्सव तानसेन समारोह की रविवार की सुबह पारंपरिक ढंग से शुरुआत हुई। यहां हजीरा स्थित तानसेन समाधि स्थल पर शहनाई वादन, हरिकथा, मिलाद, चादरपोशी और कव्वाली गायन हुआ। सुर सम्राट तानसेन की स्मृति में पिछले 96 वर्ष से आयोजित हो रहे तानसेन समारोह में देश और दुनियां के ब्राम्हनाद के शीर्षस्थ साधक तानसेन समाधि परिसर में संगीत सम्राट तानसेन को स्वरांजलि अर्पित करने आए हैं। 
तानसेन समाधि स्थल पर परंपरागत ढंग से रविवार की सुबह उस्ताद मजीद खां एवं साथियों ने रागमय शहनाई वादन किया। इसके बाद ढोलीबुआ महाराज नाथपंथी संत सच्चिदानंद नाथ ने संगीतमय आध्यात्मिक प्रवचन देते हुए ईश्वर और मनुष्य के रिश्तो को उजागर किया। उनके प्रवचन का सार था कि परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं। अल्लाह और ईश्वर, राम और रहीम, कृष्ण और करीम, खुदा और देव सब एक हैं। हर मनुष्य में ईश्वर विद्यमान है। हम सब ईश्वर की संतान हैं तथा ईश्वर के अंश भी हैं। ढोली बुआ महाराज द्वारा राग "मिश्र खमाज" में प्रस्तुत भजन के बोल थे "भज भज राधे गोविंदा"। उन्होंने प्रिय भजन "रघुपति राघव राजाराम पतित पावन सीताराम" का गायन भी किया।
हरिकथा के बाद सुनाई तकरीर
ढोलीबुआ महाराज की हरिकथा के बाद मुस्लिम समुदाय से मौलाना इकबाल लश्कर कादिरी ने इस्लामी कायदे के अनुसार मिलाद शरीफ की तकरीर सुनाई। उन्होंने कहा सबसे बड़ी भक्ति मोहब्बत है। उनके द्वारा प्रस्तुत कलाम के बोल थे " तू ही जलवानुमा है मैं नहीं हूं"। अंत में हजरत मौहम्मद गौस व तानसेन की मजार पर राज्य सरकार की ओर से सैयद जियाउल हसन सज्जादा नसीन द्वारा परंपरागत ढंग से चादरपोशी की गई। इससे पहले फरीद खानूनी, भोलू झनकार, आरिफ अली, अल्लाह रक्खा एवं उनके साथी कब्बाली गाते हुये चादर लेकर पहुंचे। कव्वाली के बोल थे खास दरबार-ए-मोहम्मद से ये आई चादर। तानसेन समाधि पर परंपरागत ढंग से आयोजित हुए इस कार्यक्रम में उस्ताद अलाउद्दीन खां कला एवं संगीत अकादमी के निदेशक जयंत भिसे, एसडीएम प्रदीप सिंह तोमर व डिप्टी कलेक्टर यूनुस कुर्रेशी तथा अभिजीत सुखदाने समेत अन्य कलारसिक, गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।